Bihar corruption news: पटना ज़िले के नौबतपुर नगर पंचायत में एक बड़ा घोटाला सामने आया है। समेकित आवास एवं स्लम विकास योजना (IHSDP) के तहत केंद्र सरकार से 49 करोड़ रुपए की राशि मंजूर करवाई गई, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि नौबतपुर में एक भी स्लम बस्ती मौजूद ही नहीं है।


फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे करोड़ों की मंजूरी

सूत्रों के अनुसार, नगर पंचायत बोर्ड से फर्जी स्लम बस्तियों को दर्शाकर योजना पास कराई गई। उसके बाद नगर विकास और आवास विभाग के माध्यम से केंद्र सरकार को डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) भेजी गई, जिसके आधार पर नौबतपुर को लगभग 45 करोड़ की राशि जारी कर दी गई। इसमें 3.5 करोड़ का गबन कर लिया गया | और तो और इस योजना का लाभ ऐसे लोगों को दी गयी जो अपात्र थे जैसे सरकारी नौकरी करने वाले और जीने जो कृषि योग्य जमीं के मालिक भी हैं ऐसे लोगों को गलत तरीके से फायदा पहुचाया  गया | 


गबन और घोटाले के पांच प्रमुख बिंदु

 फर्जी स्लम की पहचान:

नौबतपुर में कोई स्लम क्षेत्र नहीं है, फिर भी फर्जी दस्तावेज़ों पर नगर पंचायत बोर्ड से मंजूरी ली गई।


 डीपीआर बिना टेंडर के:

सरयू इंजीनियरिंग फॉर रिसोर्स डेवलपमेंट को बिना किसी टेंडर के डीपीआर बनाने का काम दे दिया गया। इसके बदले 94.83 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया।


ग़ैर-पात्र लाभार्थियों को योजना का लाभ:

सरकारी नौकरी में कार्यरत, समृद्ध परिवारों के सदस्य, खेती योग्य ज़मीन के मालिक, अन्य योजनाओं के लाभार्थी और बाहर से आकर बसे लोगों को इस योजना का लाभ दे दिया गया।


 एनजीओ का चयन बिना अनुभव किया गया 

महात्मा फुले वेलफेयर सोसाइटी नामक एनजीओ को योजना का कार्य सौंपा गया, जो तत्कालीन अध्यक्ष का करीबी बताया जा रहा है। एनजीओ का इस प्रकार के कार्यों में कोई पूर्व अनुभव नहीं था।


 करीब 3.5 करोड़ का गबन:

मंजूर की गई राशि में से अब तक लगभग 3.5 करोड़ का गबन सामने आया है।


मामला निगरानी थाने में दर्ज

नौबतपुर के दो स्थानीय नागरिकों द्वारा की गई शिकायत के आधार पर निगरानी थाना में 8 मई को केस दर्ज किया गया। मामले की जांच में तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष कौशल कौशिक और उपाध्यक्ष मीतू कुमारी समेत कई अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं।


आरोपों पर सफाई

इस मामले में नामजद तत्कालीन नौबतपुर नगर पंचायत अध्यक्ष  कौशल कौशिक का कहना है कि चुनाव नजदीक होने के कारण यह सब साजिश के तहत किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि डीपीआर को नगर विकास विभाग के माध्यम से केंद्र सरकार को भेजा गया था, जिसके बाद ही राशि स्वीकृत हुई थी।