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मंत्री अशोक चौधरी की प्रोफेसर की नौकरी पर सबसे बड़ा खुलासा: क्या वाकई हुआ फर्जीवाड़ा फिर हो रहा सियासी खेल?, वि.वि. सेवा आयोग ने किया क्लीयर

मंत्री अशोक चौधरी की असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति को लेकर उठे फर्जीवाड़े के आरोपों पर बड़ा खुलासा हुआ है. उनकी नियुक्ति पर शिक्षा विभाग ने सवाल उठाये थे, जिसका बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने विस्तृत जवाब दिया है. इसके बाद पूरा मामला साफ होता..

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14-Jan-2026 08:42 PM

By First Bihar

PATNA: बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी हालिया दिनों में नये विवादों में घिर गये हैं. दरअसल, अशोक चौधरी पर ये आरोप लगा कि उन्होंने गलत तरीके से यूनिवर्सिटी के सहायक प्राध्यापक यानि असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी हासिल कर ली है. विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने मंत्री पर गंभीर आरोप लगाये. लेकिन असली खेल तो बिहार सरकार और जेडीयू के अंदर चल रहा था. पिछले कई महीनों से अशोक चौधरी की नौकरी पर चल रहे विवाद पर अब बड़ा खुलासा हुआ है. 


पूरे मामले को समझिये

बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने करीब 5 साल पहले प्रक्रिया शुरू की थी. आयोग ने राजनीति शास्त्र के सहायर प्राध्यापक के 280 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला था. 2025 में 4 जुलाई को विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने इसका रिजल्ट निकाला. कुल 276 उम्मीदवारों का इस पद के लिए चयन किया गया.


SC कोटे से चुने गये अशोक चौधरी

4 जुलाई 2025 को आय़ोग ने राजनीति शास्त्र के जिन सफल अभ्यर्थियों के नाम का ऐलान किया, उसमें बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी का नाम भी शामिल था. अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व कोटे में 10वें नंबर पर अशोक चौधरी का नाम था. उन्हें पाटलिपुत्रा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए चुना गया था.


सरकार के अंदर से शुरू हुआ खेल

अशोक चौधरी के असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की अनुशंसा के बाद  सरकार के अंदर से दिलचस्प खेल शुरू हुआ. दरअसल, विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने सफल अभ्यर्थियों की सूची शिक्षा विभाग को भेजी थी. 1 अगस्त 2025 को विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने शिक्षा विभाग को ही सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति करने की अनुशंसा भेज दी. लेकिन उस वक्त शिक्षा विभाग के बड़े पद पर तैनात अधिकारी ने सबसे पहले उसमें छेद निकाला. दरअसल, शिक्षा विभाग के तत्कालीन बड़े अधिकारी का मंत्री अशोक चौधरी के साथ 36 का रिश्ता जगजाहिर था. अधिकारी जी उस दौर में फुल पावर में थे. लिहाजा राजनीति शास्त्र के सहायक प्राध्यपकों की नियुक्ति के फाइल को रोक दिया. 


माननीय भी कूद पड़े

शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि तब तक इस पूरे मामले की भनक शिक्षा विभाग के माननीय को लगी. दिलचस्प बात ये भी है मंत्री अशोक चौधरी, माननीय और बड़े अधिकारी तीनों समाज के एक खास तबके से ही आते हैं. शिक्षा विभाग के माननीय ने इस मुद्दे को और तूल दे दिया. अब हाल ये हुआ कि विश्वविद्यालय सेवा आय़ोग ने दूसरे विषयों के जिन सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की थी, वे बहाल कर लिये गये. लेकिन राजनीति शास्त्र की नियुक्ति रोक दी गयीं. 


विपक्षी दलों को मिला मौका

शिक्षा विभाग में हो रहे इस खेल की जानकारी विपक्षी पार्टियों तक भी पहुंचा दी गयीं. अब कांग्रेस और राजद के नेताओं को अशोक चौधरी के साथ साथ सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया. लिहाजा राजनीतिक बयानबाजी भी होने लगी.

अशोक चौधरी पर क्या था आरोप?

दरअसल, अशोक चौधरी पर शिक्षा विभाग का ये आरोप था कि उनके सर्टिफिकेट्स में कुछ जगहों पर नाम अशोक कुमार लिखा है. वहीं कुछ जगहों पर अशोक चौधरी के नाम से सर्टिफिकेट है. लिहाजा उनकी नियुक्ति गलत है. 


महीनों बाद आय़ोग को लिखा पत्र

5 महीनों तक अशोक चौधरी के खिलाफ मामले पर सरकारी खेल और सियासी बयानबाजी के बाद बिहार सरकार के शिक्षा विभाग को इस साल पहली जनवरी को ये समझ में आय़ा कि इस मसले पर विश्वविद्यालय सेवा आयोग से स्पष्टीकरण मांगना चाहिये. लिहाजा 1 जनवरी 2026 को शिक्षा विभाग के उच्च शिक्षा निदेशक ने विश्वविद्यालय सेवा आयोग को पत्र लिखा. 


उच्च शिक्षा निदेशक एन. के. अग्रवाल ने विश्वविद्यालय सेवा आयोग को लिखे गये पत्र में कहा “ आपके कार्यालय द्वारा राजनीति विज्ञान विषय के लिए सहायक प्राध्यापक के रिक्त पदों पर नियुक्ति हेतु अनुशंसा के साथ-साथ डोजियर उपलब्ध कराया गया है. उक्त पत्र में अनुसूचित जाति कोटि हेतु चयनित अभ्यर्थियों की अनुशंसित सूची के क्रमांक-10 में अंकित अभ्यर्थी के नाम एवं प्राप्त कराये गए डोजियर में उपलब्ध अभिलेखों के समीक्षोपरान्त यह स्पष्ट हो रहा है कि उक्त अभ्यर्थी के विभिन्न प्रमाण पत्रों में अंकित उनके नामों में साम्यता नहीं है. अतः आयोग इस संदर्भ में अपना मंतव्य उपलब्ध करायें कि किस परिस्थिति में आयोग द्वारा इनका नाम नियुक्ति हेतु अनुशंसित किया गया है. 


विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने दिया हर सवाल का जवाब

आय़ोग के सचिव ने अशोक चौधरी की नियुक्ति को लेकर बिहार सरकार के शिक्षा विभाग को लिखे पत्र में बिंदुवार जवाब दिया है. आयोग ने लिखा है

1.    अभ्यर्थी द्वारा ऑनलाइन आवेदन पत्र में अपना नाम अशोक कुमार अंकित किया गया है।(ऑनलाइन आवेदन पत्र की छायाप्रति संलग्न)

2.     अभ्यर्थी के मैट्रिक, इंटरमीडिएट, स्नातक एवं पी-एच.डी. सहित सभी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों पर नाम अशोक कुमार अंकित है।

3.      अभ्यर्थी के ऑनलाइन आवेदन पत्र तथा मैट्रिक प्रमाण पत्र में पिता का नाम महावीर चौधरी अंकित है।

4.    मगध कॉलेज, पटना द्वारा प्रदत्त ANUGRAH AWARD में अभ्यर्थी का नाम

Dr. Ashok Kumar alias Dr. Ashok Choudhary अंकित है।

5.     अभ्यर्थी द्वारा ऑनलाइन आवेदन के साथ संलग्न शोध आलेख

Political Awakening of Dalits in Indian Political System (WISDOM HERALD) में नाम Dr. Ashok Kumar (alias Dr. Ashok Choudhary) अंकित है.

6.     अभ्यर्थी द्वारा ऑनलाइन आवेदन के साथ संलग्न निवास प्रमाण पत्र में नाम Ashok Choudhary alias Ashok Kumar तथा पिता का नाम Mahavir Choudhary अंकित है।

7.     अभ्यर्थी द्वारा ऑनलाइन आवेदन के साथ संलग्न जाति प्रमाण पत्र में नाम Ashok Choudhary alias Ashok Kumar तथा पिता का नाम Mahavir Choudhary अंकित है।

8.     अभ्यर्थी के ऑनलाइन आवेदन में अंकित निवास का पता तथा अंचलाधिकारी, पटना द्वारा निर्गत निवास एवं जाति प्रमाण पत्रों में अंकित पता एक समान है।

9.     निवास प्रमाण पत्र एवं जाति प्रमाण पत्र निर्गत करने वाले सक्षम प्राधिकारी (अंचलाधिकारी) द्वारा निर्गत प्रमाण पत्रों में अभ्यर्थी का नाम

Ashok Choudhary alias Ashok Kumar तथा पिता का नाम Mahavir Choudhary अंकित किया गया है।

10.     अभ्यर्थी द्वारा साक्षात्कार के दिन प्रमाण-पत्र सत्यापन के समय अशोक चौधरी, सुपुत्र श्री महावीर चौधरी, के नाम से जिलाधिकारी, पटना द्वारा निर्गत एक अन्य जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया था, जिसमें निर्गमन तिथि अंकित नहीं थी। उक्त प्रमाण पत्र अभ्यर्थी द्वारा ऑनलाइन आवेदन के साथ संलग्न नहीं किया गया था। आयोग द्वारा केवल उन्हीं प्रमाण पत्रों पर विचार किया जाता है, जो ऑनलाइन आवेदन के साथ संलग्न हों। अतः उक्त प्रमाण पत्र पर आयोग द्वारा संज्ञान नहीं लिया गया।

11.    आयोग द्वारा विभाग को प्रेषित अनुशंसा पत्रांक B.S.U.S.C./विज्ञा–07/2024 (खंड–10)–2381, दिनांक 01.08.2025 की कंडिका–06 में स्पष्ट किया गया है कि: “नियुक्ति से पूर्व विभाग/नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा सभी अभ्यर्थियों के चरित्र एवं पूर्ववृत्त की जांच के साथ-साथ शैक्षणिक योग्यता, अनुभव प्रमाण पत्र, जन्म-तिथि, दिव्यांगता प्रमाण पत्र तथा आरक्षण कोटि से संबंधित समस्त प्रमाण-पत्रों का सत्यापन किया जाना अनिवार्य होगा.”आय़ोग ने कहा है कि इस आलोक में प्रमाण पत्र निर्गत करने वाले प्राधिकार से प्रमाण-पत्रों की जांच कराई जा सकती है.


नहीं हुआ कोई फर्जीवाड़ा

विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने शिक्षा विभाग को साफ किया है कि अशोक कुमार,( UID No.– ASH25021968POL0073546) का साक्षात्कार के उपरांत तैयार मेधा सूची के आधार पर अनुसूचित जाति कोटि अंतर्गत चयन किया गया है तथा अन्य चयनित अभ्यर्थियों के साथ इनकी नियुक्ति संबंधी अनुशंसा विभाग को प्रेषित की गई है. तथ्यों एवं अभिलेखों के आधार पर यह पाया गया कि उपर्युक्त सभी नाम एक ही व्यक्ति से संबंधित हैं। अतः आयोग द्वारा अभ्यर्थी अशोक कुमार की नियुक्ति की अनुशंसा की गई है, जिस पर आयोग का विधिवत अनुमोदन प्राप्त है.


सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट भी दे चुका है फैसला

दरअसल, ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट औऱ हाईकोर्ट के फैसले भी आ चुके हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समीर राव बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में कहा है कि किसी व्यक्ति का नाम उसकी निजी पहचान का बहुत अहम हिस्सा होता है.  अदालत ने बताया कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को यह आज़ादी है कि वह अपने नाम को अपनी पसंद के तरीके से इस्तेमाल करे. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सरकार या उसका कोई विभाग किसी व्यक्ति को उसके चुने हुए नाम का उपयोग करने से नहीं रोक सकता, जब तक कि ऐसा रोकना संविधान के अनुच्छेद 19(2) या किसी न्यायसंगत और उचित कानून के तहत जरूरी न हो।


इसी तरह, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने मो. हसन बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश मामले में कहा कि नाम बदलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) से जुड़ा हुआ है. अदालत ने यह भी कहा कि नाम बदलने का अधिकार कानून द्वारा सुरक्षित है और सामान्य हालात में किसी व्यक्ति को सिर्फ तकनीकी कारणों की वजह से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता.


वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जिग्या यादव बनाम सीबीएसई मामले में कहा है कि किसी व्यक्ति की पहचान कई गुणों से बनती है और नाम उसकी पहचान का सबसे अहम हिस्सा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति को अपने नाम पर पूरा अधिकार और नियंत्रण होना चाहिए, जिसमें उचित कारण से नाम बदलने का अधिकार भी शामिल है. अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत पहचान को अपनी पसंद के तरीके से व्यक्त करना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षित हिस्सा है.


अशोक चौधरी की नियुक्ति का रास्ता साफ

जाहिर है, विश्वविद्यालय सेवा आयोग के जवाब और विभिन्न कोर्ट के फैसलों से मंत्री अशोक चौधरी का प्रोफेसर पद पर नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है. लेकिन सवाल ये है कि क्या सरकार में ही बैठे लोग खामोश बैठेंगे. इसके लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा.