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Bihar Flood: गंगा का बढ़ता जलस्तर बना संकट, भोजपुर के 289 स्कूल बंद; हजारों लोग विस्थापित

Bihar Flood: गंगा के कटाव से उजड़े घर अब बाढ़ की चपेट में हैं। भोजपुर के दियारा क्षेत्र में सैकड़ों परिवार तंबू-टेंट में रहने को मजबूर हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि जिले के 289 स्कूलों को बंद करना पड़ा है।

Bihar Flood Update

11-Aug-2025 07:55 AM

By First Bihar

Bihar Flood: बिहार में गंगा नदी की विकराल बाढ़ ने भोजपुर जिले के शाहपुर और बड़हरा प्रखंडों के दियारा क्षेत्रों में भारी तबाही मचा रखी है। शाहपुर के दामोदरपुर तटबंध और जवईनिया गांव पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। यहां के दर्जनों घर गंगा में विलीन हो चुके हैं, और सैकड़ों परिवार तटबंध पर तंबू व तिरपाल के नीचे जीवन यापन को मजबूर हैं।


जवईनिया गांव में पिछले वर्ष 59 घर कटाव की भेंट चढ़ गए थे। इस वर्ष हालात और भी गंभीर हैं — वार्ड चार और पांच के लगभग 150 घर, मंदिर, पेड़ और जल टंकी गंगा में समा चुके हैं। अब इन वार्डों में केवल एक-दो घर ही बचे हैं। प्रशासन ने करीब पांच किलोमीटर लंबे तटबंध पर टेंट, पंडाल और तिरपाल लगवाकर प्रभावितों के लिए शिविर स्थापित किए हैं।


बड़हरा की ख्वासपुर पंचायत के 16 गांवों में करीब एक लाख लोग हर साल छह महीने तक बाढ़ की स्थिति में रहते हैं। इन लोगों के लिए जिला मुख्यालय आरा या प्रखंड मुख्यालय बड़हरा तक पहुंचने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है। गंगा पार इस पंचायत की कुल आबादी लगभग डेढ़ लाख है, जो हर साल इसी तरह की पीड़ा झेलती है।


प्रशासन ने बाढ़ प्रभावितों के लिए आवागमन हेतु नि:शुल्क नाव सेवा की व्यवस्था की है। SDRF की टीम राहत और बचाव कार्यों में जुटी हुई है। इसके अतिरिक्त, मेडिकल टीमों को भी शिविरों में तैनात किया गया है, ताकि लोगों को आवश्यक प्राथमिक चिकित्सा मिल सके। पशुओं के चारे और पीने के पानी की व्यवस्था भी की जा रही है, परंतु ज़मीनी हकीकत यह है कि संसाधन सीमित हैं और जरूरतें बहुत अधिक।


जिले के बाढ़ प्रभावित इलाकों के 289 स्कूलों को 13 अगस्त तक बंद कर दिया गया है, जिससे हजारों बच्चों की पढ़ाई बाधित हो गई है। प्लस टू स्तर के स्कूलों के आवश्यक शैक्षणिक उपकरणों को अन्य सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया गया है।


जवईनिया गांव के 2500 की आबादी में अधिकतर बिंद, मल्लाह और यादव जातियों के लोग हैं। कुछ ब्राह्मण परिवार भी बाढ़ के कारण विस्थापित हो चुके हैं। कई लोग अपने रिश्तेदारों के पास बिहिया चौरास्ता, बक्सर या ब्रह्मपुर में शरण लेकर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं।


धर्मेंद्र बिंद की पत्नी काजल अपने चार माह के शिशु को लेकर टेंट में रह रही हैं। दो साल पहले शादी के समय जिस घर में खुशहाली थी, वह अब गंगा में समा चुका है। काजल बताती हैं, “पति परदेस में मजदूरी करते हैं। यहां घर नहीं रहा, तो टेंट ही सहारा है।” ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जिनके पास न तो रोजगार बचा है और न ही छत।