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लालू पाठशाला’ पर सियासी संग्राम: तेजस्वी के बयान पर HAM का जवाब- सम्राट चौधरी संघर्ष से निकले हुए नेता हैं...

‘लालू पाठशाला’ को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। तेजस्वी यादव द्वारा सम्राट चौधरी को RJD की उपज बताने पर HAM ने तीखा पलटवार किया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने लालू यादव के शासनकाल पर सवाल उठाए हैं.

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Viveka Nand
3 मिनट

Bihar News: सम्राट चौधऱी को लालू यादव की पाठशाला का छात्र बताया जा रहा है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा है कि सम्राट चौधरी राजद की उपज हैं. इसके बाद सत्ता पक्ष ने तेजस्वी यादव को करारा जवाब दिया है. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने लालू पाठशाला के सिलेबस की चर्चा कर तेजस्वी यादव पर तंज कसा है. 

हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि तेजस्वी यादव, जिस ‘पाठशाला’ की बात कर रहे हैं, उस पर भी एक नज़र डालनी चाहिए। लालू प्रसाद यादव के दौर में बिहार ने क्या देखा, यह देश जानता है। उस दौर में बिहार अपराध, अपहरण और भय का पर्याय बन गया था। हर जिले में तथाकथित ‘समीकरण’ के नाम पर माफियाओं को संरक्षण मिला। उद्योग-धंधे बंद हुए, निवेश भागा और बिहार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचा।

सबसे बड़ा सवाल—क्या उस दौर में वास्तव में दलित, वंचित और गरीब समाज को सशक्त किया गया, या केवल उन्हें राजनीतिक नारे और वोट बैंक तक सीमित कर दिया गया?सामाजिक न्याय के नाम पर जिन लोगों ने राजनीति की, उन्होंने क्या सच में दलित समाज को शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक भागीदारी दी? या फिर कुछ परिवारों और चंद लोगों तक ही सत्ता और संसाधन सीमित रह गए? यही कारण है कि कई सच्चे समाजवादी और विचारधारा से जुड़े लोग उस व्यवस्था से अलग हो गए। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि यह संघर्ष नहीं, बल्कि सत्ता तक सीमित राजनीति बनकर रह गया है। 

उन्होंने तेजस्वी यादव से सवाल किया, पूछा- आज भी जब आप बड़े-बड़े दावे करते हैं, तो दलित और वंचित समाज पूछ रहा है—हमें अधिकार मिला या सिर्फ नारा? हमें अवसर मिला या सिर्फ इस्तेमाल किया गया? दूसरी ओर, सम्राट चौधरी संघर्ष से निकले हुए नेता हैं—जिन्होंने संगठन और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया है। उनका उदय किसी वंशवाद का परिणाम नहीं, बल्कि मेहनत, प्रतिबद्धता और जनविश्वास का प्रतीक है। बिहार अब प्रतीकों की राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक सशक्तिकरण चाहता है—जहाँ दलित, गरीब और वंचित समाज को सिर्फ नारे नहीं, बल्कि अवसर, सम्मान और भागीदारी मिले। राजनीति में भाषा की मर्यादा और तथ्यों का सम्मान आवश्यक है। बिहार अब आगे बढ़ना चाहता है—पुराने ढांचे और सोच की ओर लौटना नहीं।”


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रिपोर्टर

Viveka Nand

FirstBihar संवाददाता