Bihar MLC Election: बिहार विधान परिषद की दरभंगा स्नातक सीट से चुनाव लड़ रहे छात्र नेता दिलीप कुमार ने मतगणना के दौरान ही अपनी हार स्वीकार कर ली है। छात्रों और शिक्षकों के मुद्दों को लेकर सड़कों पर संघर्ष करने वाले दिलीप कुमार ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि शिक्षित मतदाता उनके 11 साल के संघर्ष और काम को देखते हुए प्रथम वरीयता के वोट से ही जीत दिलाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि अगर उनके पास पर्याप्त पैसा और संसाधन होते, तो चुनाव का परिणाम कुछ और हो सकता था।
मीडिया से बातचीत में दिलीप कुमार ने कहा कि वह जीत की उम्मीद के साथ चुनाव मैदान में उतरे थे। उन्होंने बताया कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के सभी मतदाता शिक्षित हैं और वह पिछले 11 वर्षों से शिक्षकों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं। इसी वजह से उन्हें उम्मीद थी कि मतदाता उनके काम को समझेंगे और प्रथम वरीयता के वोट से ही उन्हें जीत मिलेगी। हालांकि, उन्होंने कहा कि शायद उनमें ही कोई कमी रह गई, जिस वजह से लोगों ने उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं दिया। इसके बावजूद उन्हें इस बात की खुशी है कि उन्हें जो भी वोट मिल रहे हैं, वे उनके चेहरे, नाम और काम के आधार पर मिल रहे हैं।
दिलीप कुमार ने चुनाव प्रचार के दौरान संसाधनों की कमी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने मतदाताओं पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया। उनके मुताबिक, किसी भी बूथ पर उनका कार्यकर्ता मौजूद नहीं था और न ही वह मतदाताओं के लिए टेंट या पानी की व्यवस्था कर सके। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने उन्हें वोट दिया, वे अपने साधनों से मतदान करने पहुंचे। दिलीप कुमार के अनुसार, सीमित संसाधनों के कारण वह सभी मतदाताओं तक नहीं पहुंच पाए, जिसका असर उनके वोटों पर पड़ा।
छात्र नेता ने कहा कि उन्हें अब जीत की उम्मीद नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार सर्वेश कुमार पहले राउंड से ही आगे चल रहे हैं। दिलीप कुमार ने अनुमान जताया कि उन्हें इस चुनाव में 6,000 से 7,000 वोट मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मेरे पास पैसा होता तो मैं जीत जाता। अगर हम गाड़ी की व्यवस्था करके मतदाताओं को बूथ तक पहुंचा देते, तो आज हम जीत जाते।
दिलीप कुमार ने कम वोट मिलने के दो प्रमुख कारण भी बताए। पहला, उनके पास पर्याप्त पैसा और संसाधन नहीं थे और दूसरा, उनका कोई मजबूत संगठन नहीं था। उन्होंने कहा कि अगर छात्र एकजुट होकर संगठित तरीके से काम करते, तो चुनाव में उन्हें बेहतर समर्थन मिल सकता था।
दिलीप कुमार ने बताया कि उन्होंने स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव इसलिए लड़ा, क्योंकि उनके अनुसार संविधान में ऐसे प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है, जिसके जरिए स्नातकों के मुद्दों को उठाने वाले लोग विधान परिषद तक पहुंच सकें। उन्होंने कहा कि स्नातकों, छात्रों और युवाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को सदन में पहुंचना चाहिए, ताकि वे उनकी समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठा सकें।
दिलीप कुमार ने राजनीतिक दलों पर प्रत्याशी चयन में पैसे को महत्व देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों से संपर्क किया था और कुछ दलों ने उन्हें बुलाया भी, लेकिन उनके मुताबिक, प्रत्याशी बनने के लिए 3 करोड़ से 5 करोड़ रुपये तक की मांग की जाती है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी रकम देना उनके लिए संभव नहीं था। इसी वजह से उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और अपने संघर्ष के दम पर मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की।





