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अनुसूचित जाति में वर्गीकरण से आरक्षण खत्म होने का झूठ कौन फैला रहा है? मंत्री संतोष सुमन ने विरोधियों से पूछे सवाल

मंत्री संतोष कुमार सुमन ने अनुसूचित जाति के भीतर उप-वर्गीकरण को लेकर विरोधियों से सवाल पूछे हैं। उन्होंने कहा कि ‘कोटे में कोटा’ आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि सबसे वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की पहल है।

Bihar Politics
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Mukesh Srivastava
6 मिनट

Bihar Politics: हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा है कि वह और उनकी पार्टी अनुसूचित जाति का आरक्षण खत्म करने की नहीं, आरक्षण के भीतर सबसे वंचितों को उनका उचित हिस्सा दिलाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसे आरक्षण खत्म करने का नाम देकर गरीब और वंचित समाज को डराना बंद कीजिए। अनुसूचित जाति के भीतर ‘कोटे में कोटा’ को लेकर बिहार में जिस तरह का भ्रम फैलाया जा रहा है, उस पर अब हवा-हवाई बात नहीं, तथ्यों और तर्क से बात होनी चाहिए। 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनुसूचित जाति के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से संभव माना, बशर्ते उसके पीछे तर्कसंगत आधार और पर्याप्त अनुभवजन्य आंकड़े हों।  फिर बिहार में इस मांग को आरक्षण समाप्त करने से जोड़कर डराने की राजनीति क्यों? पूछिएगा—वर्गीकरण आरक्षण खत्म करना है या आरक्षण के लाभ को अधिक न्यायपूर्ण तरीके से बांटना?



देश के दूसरे राज्यों के उदाहरण सामने हैं। हरियाणा में अनुसूचित जाति के 20 प्रतिशत आरक्षण को 10 प्रतिशत वंचित अनुसूचित जातियां और 10 प्रतिशत अन्य अनुसूचित जातियां में बांटा गया है। आंध्र प्रदेश में 15 प्रतिशत को 1%, 6.5% और 7.5%, तथा तेलंगाना में 1%, 9% और 5% के तीन समूहों में बांटा गया है। कर्नाटक ने भी तीन समूहों के लिए 6%, 6% और 5% का कानून बनाया है, हालांकि वहां कानूनी प्रश्न हैं। तमिलनाडु में अनुसूचित जाति आरक्षण के भीतर अरुंधतियार समुदाय के लिए विशेष आंतरिक आरक्षण है।  यानी कुल आरक्षण खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसी आरक्षण के भीतर हिस्सेदारी को अधिक न्यायपूर्ण बनाने का प्रयास हुआ। तो बताइएगा, मेरे भाई—दूसरे राज्यों में यह व्यवस्था हो सकती है तो बिहार में करने से आरक्षण समाप्त कैसे हो जाएगा?



वर्गीकरण का विरोध करने वालों से मेरे आठ सीधे सवाल :

① क्या ओबीसी-1 और ओबीसी-2 का वर्गीकरण गलत है?

«संदर्भ: जब पिछड़े वर्गों के भीतर अलग-अलग स्तर की वंचना को पहचानना संभव है, तो अनुसूचित जाति की वास्तविक वंचना की पहचान गलत कैसे हो गई?»


② क्या ओबीसी और ईबीसी को अलग-अलग श्रेणियों में रखना सामाजिक न्याय के खिलाफ है?

«संदर्भ: बिहार में सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के आधार पर नीतियां बनी हैं। फिर अनुसूचित जाति के भीतर असमानताओं का अध्ययन क्यों नहीं?»


③ क्या आप अनुसूचित जाति के सभी समुदायों के जातिवार सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व के वास्तविक आंकड़े सामने लाने के पक्ष में हैं?

«संदर्भ: आंकड़े बताएंगे कि आरक्षण का लाभ किसे कितना मिला और कौन पीछे रह गया। पहले सच सामने आए, फिर नीति बने।»


④ अगर दशकों बाद भी हमारे समाज के किसी हिस्से की साक्षरता दर 30 प्रतिशत से कम रहने जैसी स्थिति है, तो शिक्षा के मोर्चे पर विशेष प्रयास क्यों नहीं होने चाहिए?

«संदर्भ: सवाल केवल आरक्षण का नहीं है। हमारे बच्चों को स्कूल, कॉलेज और उच्च शिक्षा तक पहुंचाना भी सामाजिक न्याय है।»


⑤ क्या आप चाहते हैं कि हमारे बच्चे केवल आरक्षण पर निर्भर रहें, या शिक्षा, योग्यता और कौशल के बल पर आगे बढ़ें?

«संदर्भ: हमारा लक्ष्य अगली पीढ़ी को इतना सक्षम बनाना है कि वह अपने अधिकारों के साथ अपनी योग्यता के बल पर भी आगे बढ़े।»


⑥ अगर आप वर्गीकरण के विरोध में हैं, तो सबसे पीछे छूटे समुदायों को आगे लाने का आपका ठोस वैकल्पिक मॉडल क्या है?

«संदर्भ: सिर्फ विरोध समाधान नहीं है। बिहार की जनता को अपना विकल्प भी बताइएगा।»


⑦ अगर आंकड़े किसी अनुसूचित जाति समुदाय की लगातार वंचना और कम प्रतिनिधित्व साबित करें, तो क्या आप उसके लिए लक्षित नीतिगत उपायों का समर्थन करेंगे?

«संदर्भ: सामाजिक न्याय का आधार नारा नहीं, वास्तविक स्थिति और प्रमाणित आंकड़े होने चाहिए।»


⑧ अगर अनुसूचित जाति के भीतर सबसे कमजोर समुदायों तक आरक्षण और विकास का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा है, तो उनकी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था का आप समर्थन करेंगे या नहीं?

«संदर्भ: सवाल किसी का अधिकार छीनने का नहीं, बल्कि सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक उसका हक पहुंचाने का है।»



हम किसी का आरक्षण खत्म करने की बात नहीं कर रहे। हमारी मांग है कि जातिवार सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व का वैज्ञानिक अध्ययन हो और उसी आधार पर न्यायपूर्ण वर्गीकरण किया जाए। जिस समुदाय को जितना वंचित पाया जाए, उसकी हिस्सेदारी और अवसर उसी अनुरूप सुनिश्चित हों। ‘कोटे में कोटा’ आरक्षण खत्म करने की व्यवस्था नहीं, आरक्षण के भीतर न्यायपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है। मसीहा बनने की राजनीति बहुत हो चुकी। अब सबसे वंचित दलित के हक, शिक्षा और भविष्य पर स्पष्ट जवाब चाहिए।



और एक बात —“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी ” का नारा आखिर किस बात का था? अगर संख्या के आधार पर हिस्सेदारी की बात सामाजिक न्याय है, तो अनुसूचित जाति के भीतर वास्तविक वंचितता और प्रतिनिधित्व के आंकड़ों के आधार पर हिस्सेदारी की मांग से डर काहे लगता है? क्या इन नारों को, जो आपके और हमारे भी आदरणीय नेता लगाया करते थे, भूल गए? तब यह सामाजिक न्याय था और आज सबसे वंचितों की हिस्सेदारी की बात गलत कैसे हो गई? बताइएगा, डर काहे लगता है? आंकड़ों से डर काहे लगता है?



गलतफहमी से नहीं, आंकड़ों से बात होगी। आरोप से नहीं, काम के रिकॉर्ड से बात होगी। और सिर्फ मसीहा बनने से नहीं—दलितों के लिए किए गए काम का हिसाब देने से बात होगी। गरीबों और वंचितों के हक के रास्ते में खड़े होने वाले ‘नव-दलित सामंतों’ को भी जनता के सामने अपना हिसाब देना होगा। बिहार की जनता के सामने साफ जवाब दीजिए—अगर “जिसकी जितनी संख्या भारी, हिस्सेदारी उतनी” सही था, तो सबसे वंचितों की हिस्सेदारी की बात गलत कैसे हो गई?

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FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता