1st Bihar Published by: FIRST BIHAR Updated Wed, 18 Feb 2026 01:01:18 PM IST
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Bihar Assembly: बिहार विधान परिषद की कार्यवाही शुरू हो गई है। कार्यवाही के दौरान जेडीयू विधान पार्षद नीरज कुमार ने अपनी ही सरकार को फंसा दिया। नीरज कुमार ने सदन में सरकार से पूछा कि जब बकाश्त भूमि का लगान जमा नहीं होता है तो राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ऐसी भूमि का रैयतीकरण कैसे करा रहा है? इसपर राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री विजय सिन्हा को जवाब देना पड़ा।
दरअसल, जेडीयू एमएलसी नीरज कुमार ने सदन में कहा बकाश्त भूमि पूरे बिहार की समस्या है। इसमें स्पष्टता की कमी है। इस मामले पर पूरा बिहार परेशान है। विभाग को इसे स्पष्ट करना चाहिए। 1950 की धारा 5 के तहत जो जमीनदार लोग थे और जो भूतपूर्व मध्यवर्ति माने जाते थे, उनको आवासीय भूमि का लगान नहीं देना पड़ता था।
उन्होंने कहा कि सरकार का 2014 का संकल्प है कि यदि खतियान में बकास दर्ज है, किसी और की जमाबंदी है, लगान रसीद कट रहा है तो ऐसी भूमि धारा 6 के तहत दर्ज व्यक्ति के नाम की मानी जाएगी, तो फिर रैयतीकरण कैसे किया जा रहा है? 2014 में संकल्प निकाला गया तो उसके पहले की बकाश्त भूमि वैध है या अवैध है? सरकार अपने संकल्प के विभागीय विराधाभास को देखे। डीसीएलआर को दिए गए अधिकार के कारण यह परेशानी आ रही है।
नीरज कुमार के सवाल पर राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने इसका जवाब सदन मे दिया। उन्होंने कहा कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 5,6 और 7 के अनुसार लगान निर्धारण होकर राजस्व रसीद कट रही हो तभी नियमानुकूल बकाश्त भूमि को रैयती भूमि मानी जाएगी। बिहार भूमि सुधार अधिनियम 2010 ग्रामीण क्षेत्र की रैयती भूमि पर ही लागू है। स्पष्ट है कि बकाश्त भूमि को जबतक रैयती भूमि का दर्जा नहीं प्राप्त होगा तबतक ग्रामीण क्षेत्र की रैयती भूमि का समपरिवर्तन नियमानुकूल उचित नहीं है।
इसपर नीरज ने कहा कि यही तो मेरा प्रश्न है कि जब पूर्व से रसीद कट रहा है तो बकाश्त भूमि के रैयतीकरण का औचित्य क्या है। इसपर विजय सिन्हा ने कहा कि बकाश्त भूमि के संदर्भ में विभाग मे कमेटी बना दी गई है क्योंकि यह मामला जटिल और बहुत ही संवेदनशील है। कमेटि के माध्यम से निर्णय लिटा जाएगा। इसको बिना समझे बूझे कुछ कहना उचित नहीं होगा।
बता दें कि बकाश्त भूमि वह जमीनें होती हैं जो किसी जमींदार या भू-स्वामी द्वारा अपने निजी उपयोग या खेती के लिए रखी जाती थी। पहले के समय में जब जमींदारी व्यवस्था लागू थी, तब जमींदार कुछ जमीन खुद खेती करने के लिए अपने पास रखते थे। उसी जमीन को बकाश्त भूमि कहा जाता था। यह जमीन जमींदार या मालिक की व्यक्तिगत खेती के लिए होती थी। इस जमीन पर आम तौर पर किसी रैयत (किरायेदार किसान) का अधिकार नहीं होता था। जमींदारी उन्मूलन के बाद कई जगहों पर इस जमीन का स्वामित्व सरकार या वास्तविक खेती करने वालों को दिया गया। कई मामलों में इस जमीन को लेकर विवाद भी होते हैं, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड और कब्जे में अंतर पाया जाता है।