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Life Style: हर जिद पूरी करना नहीं है परवरिश का सही तरीका, जानिए... किन बातों में बच्चों को ‘ना’ कहना है जरूरी?

Life Style: बच्चे छोटे हों या बड़े, वे अक्सर पैरेंट्स से किसी न किसी चीज़ की जिद करते रहते हैं. बचपन में उनकी ये जिदें ज़्यादा बेतुकी और तुरंत पूरी करने की होती हैं , लेकिन यह हानिकारक भी साबित हो सकता है. जानें... कैसे?

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Viveka Nand
5 मिनट

Life Style: बच्चे छोटे हों या बड़े, वे अक्सर पैरेंट्स से किसी न किसी चीज़ की जिद करते रहते हैं। बचपन में उनकी ये जिदें ज़्यादा बेतुकी और तुरंत पूरी करने की होती हैं। कई बार पैरेंट्स यह सोचकर उनकी जिदें मान लेते हैं कि इससे बच्चा खुश हो जाएगा या शांत रहेगा, लेकिन हर बार बच्चे की हर मांग पूरी करना कहीं न कहीं उनके व्यवहार और सोच में असंतुलन ला सकता है।


अगर आप हर बार बिना सोचे-समझे उनके ‘ना जरूरी’ या 'बेतुकी' डिमांड्स पूरी करते हैं, तो आगे चलकर बच्चा बिना मेहनत के हर चीज़ हासिल करने की अपेक्षा करने लगता है। इससे इमोशनल कंट्रोल, सेल्फ डिसिप्लिन और फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस जैसी ज़रूरी लाइफ स्किल्स कमजोर हो जाती हैं।


तुरंत कुछ दिलवाने की जिद, "अभी चाहिए, तो अभी चाहिए"

कुछ बच्चे बहुत इंपल्सिव (बिना सोचे-समझे तात्कालिक प्रतिक्रिया देने वाले) हो जाते हैं। जब उन्हें कोई चीज़ पसंद आती है, तो वे उसी पल उसे पाने की जिद करने लगते हैं। पैरेंट्स पब्लिक प्लेस में शर्मिंदगी से बचने या रोने-धोने से बचने के लिए अक्सर उनकी बात मान लेते हैं। बच्चे को शांत करके समझाएं कि हर चीज़ तुरंत नहीं मिलती। समय और जरूरत का अंतर सिखाएं। उसके "ना" सुनने की क्षमता को धीरे-धीरे बढ़ाएं।


हर बार मनपसंद खाना खाने की जिद

बच्चे हेल्दी फूड देखकर अक्सर नखरे करते हैं और अपनी फेवरिट डिश की डिमांड करते हैं। कई माता-पिता उन्हें टालने के लिए तुरंत फास्ट फूड या जंक फूड दे देते हैं। इससे ना सिर्फ बच्चे की खानपान की आदतें खराब होती हैं, बल्कि वह ये भी सीखता है कि जिद कर के मनचाही चीज़ मिल सकती है। हफ्ते में एक दिन ‘फेवरिट फूड डे’ रखें। हेल्दी फूड को क्रिएटिव और एंगेजिंग तरीकों से परोसें। बच्चे को खाना बनाने में शामिल करें, इससे उनकी रूचि बढ़ेगी।


स्क्रीन टाइम की जिद – फोन, टैब या टीवी

आज के डिजिटल युग में स्क्रीन टाइम बच्चों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। पैरेंट्स कई बार चुप कराने, खाना खिलाने या सोने से पहले उन्हें मोबाइल या टीवी दे देते हैं। लेकिन यह आदत बच्चे की मेमोरी, कंसंट्रेशन, नींद और बिहेवियर पर नकारात्मक असर डालती है। ऐसे में स्क्रीन टाइम को एक टाइम टेबल से जोड़ें। रिवार्ड सिस्टम बनाएं जैसे अच्छे व्यवहार पर सीमित समय के लिए कार्टून। स्क्रीन के बदले बोर्ड गेम्स, कहानियां और क्रिएटिव एक्टिविटीज अपनाएं।


पब्लिक प्लेस में रोकर जिद मनवाना

दुकान, मॉल या किसी समारोह में रोकर, ज़िद कर के चीज़ मनवाना बहुत आम है। लेकिन अगर आप हर बार ऐसा करते हैं, तो बच्चे को ये पैटर्न समझ आने लगता है कि लोगों के सामने रोने से चीज़ें जल्दी मिलती हैं। यह आदत आगे चलकर इमोशनल मैनिपुलेशन का रूप ले सकती है। साथ ही इस सिचुएशन में पब्लिक प्लेस में पहले से नियम तय कर के जाएं। शांत रहने पर पॉजिटिव रिवार्ड दें, ना कि नेगेटिव बिहेवियर पर। घर लौटने पर ही पॉजिटिव डिस्कशन करें डांटने के बजाय समझाएं।


दूसरों जैसी चीजें लेने की जिद

“मुझे भी वैसा खिलौना चाहिए”, “मेरे दोस्त के पास वो वीडियो गेम है, मुझे भी चाहिए।” ये बातें सामान्य हैं, लेकिन अगर हर बार आप ऐसी मांगें पूरी करते हैं, तो इससे बच्चे में इनसिक्योरिटी, जलन और अनहेल्दी कंपैरिजन की भावना विकसित हो सकती है। अगर इस मामले में बच्चे से डील करने के लिए यूनिकनेस का महत्व समझाएं। बताएं कि ज़रूरी नहीं जो दूसरों के पास है, वही आपके पास भी हो। उन्हें चीज़ों की वैल्यू और लिमिटेड रिसोर्सेस का कॉन्सेप्ट सिखाएं।


बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को ‘ना’ सुनने की आदत भी उतनी ही जरूरी है जितनी ‘हाँ’ की। हर बात मनवाने की आदत उन्हें न केवल स्वार्थी बनाती है, बल्कि दूसरों की भावनाओं को न समझने वाला वयस्क भी बना सकती है।बच्चों को हर बार खुश करने के चक्कर में लॉन्ग टर्म नुकसान को नज़रअंदाज़ ना करें। प्यार, अनुशासन और समझदारी के संतुलन से ही बेहतर परवरिश संभव है। जिद पर संयम और प्यार से ना कहना भी एक कला है, जो बच्चे को जीवनभर के लिए सक्षम बनाती है।