ब्रेकिंग
कोर्ट के आदेश पर दखल-दिहानी के दौरान हंगामा, सीओ की गाड़ी का घेराव, मंत्री से पैसा खाने का आरोप सम्राट चौधरी को 'सड़क छाप गुंडा' कहे जाने पर भड़के रोहित सिंह, कहा..तेजस्वी यादव खुद 'लफुआ' हैरोहतास में दिनदहाड़े ज्वेलरी शॉप में लूट, 35 लाख के आभूषण लेकर हथियारबंद अपराधी फरारबागमती नदी में नहाने के दौरान तीन लड़कियां डूबीं, दो को लोगों ने बचाया; एक की तलाश जारीबांकीपुर उपचुनाव: NDA ने किया जीत का दावा, प्रशांत किशोर के जीविका दीदी वाले बयान पर पलटवार; तेजस्वी यादव पर साधा निशानाकोर्ट के आदेश पर दखल-दिहानी के दौरान हंगामा, सीओ की गाड़ी का घेराव, मंत्री से पैसा खाने का आरोप सम्राट चौधरी को 'सड़क छाप गुंडा' कहे जाने पर भड़के रोहित सिंह, कहा..तेजस्वी यादव खुद 'लफुआ' हैरोहतास में दिनदहाड़े ज्वेलरी शॉप में लूट, 35 लाख के आभूषण लेकर हथियारबंद अपराधी फरारबागमती नदी में नहाने के दौरान तीन लड़कियां डूबीं, दो को लोगों ने बचाया; एक की तलाश जारीबांकीपुर उपचुनाव: NDA ने किया जीत का दावा, प्रशांत किशोर के जीविका दीदी वाले बयान पर पलटवार; तेजस्वी यादव पर साधा निशाना

डिजिटल दुनिया बढ़ा रही है अकेलापन और गुस्सा! जानिए स्क्रीन टाइम का मानसिक स्वास्थ्य पर असर

क्या सोशल मीडिया और बढ़ता स्क्रीन टाइम आपके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है? जानिए विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल दुनिया कैसे बढ़ा रही है अकेलापन, तनाव, गुस्सा और त्वरित खुशी की चाह, साथ ही डिजिटल डिटॉक्स के आसान उपाय।

बिहार न्यूज
डिजिटल जीवनशैली बन रही है नई चुनौती
© AI-generated image
Jitendra Vidyarthi
5 मिनट

DESK: स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरणों ने जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इनके बढ़ते उपयोग का असर अब मानसिक स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों की माने तो लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से लोगों में अकेलापन, तनाव, अधीरता, गुस्सा और त्वरित खुशी पाने की इच्छा तेजी से बढ़ रही है। इससे ना केवल सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो रहा है, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।


डिजिटल जीवनशैली बन रही है नई चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दुनिया में लगातार सक्रिय रहने की आदत एक नई जीवनशैली संबंधी समस्या का रूप ले चुकी है। इसके कारण लोग वास्तविक जीवन के संवाद, धैर्य और भावनात्मक जुड़ाव से दूर होते जा रहे हैं।


इसके प्रमुख लक्षण हैं—

पूरी तरह खुशी महसूस न कर पाना।

छोटी-छोटी बातचीत करने में असहजता।

नींद में कमी या बार-बार बाधा आना।

तनाव, बोरियत और अकेलेपन का अहसास।

सामाजिक मेलजोल में कमी।

दूसरों के प्रति समानुभूति का घटता भाव।

धैर्य की कमी और तुरंत खुशी पाने की तीव्र इच्छा।

सोशल मीडिया कैसे बदल रहा है हमारी सोच?


विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से लोग लाइक, कमेंट और शेयर जैसी त्वरित प्रतिक्रियाओं को ही खुशी का पैमाना मानने लगे हैं। इससे स्थायी संतुष्टि की बजाय क्षणिक खुशी की चाह बढ़ती जा रही है। इसके अलावा सोशल मीडिया 'कन्फर्मेशन बायस' को भी बढ़ावा देता है। यानी लोग केवल वही सामग्री देखना और स्वीकार करना पसंद करते हैं, जो उनके पहले से बने विचारों का समर्थन करती हो। इससे असहमति, आक्रोश और नकारात्मक प्रतिक्रिया बढ़ती है तथा संतुलित सोच कमजोर पड़ती है।


घट रही है आमने-सामने बातचीत की आदत

ऑनलाइन दुनिया में लोग घंटों अनजान लोगों से बातचीत कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में संवाद करने का आत्मविश्वास कम होता जा रहा है। भाषा, व्यवहार और सामाजिक कौशल भी प्रभावित हो रहे हैं। परिवार और दोस्तों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने की आदत लगातार कम हो रही है।


रील और रियल के बीच मिट रही है दूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर हिंसा, आक्रामक भाषा और नकारात्मक व्यवहार को बार-बार देखने से लोग इन्हें सामान्य मानने लगते हैं। धीरे-धीरे यही व्यवहार वास्तविक जीवन में भी दिखाई देने लगता है और संवेदनशीलता कम होने लगती है।


मानसिक ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य भी हो रहा प्रभावित

लगातार स्क्रीन के सामने रहने से नींद की गुणवत्ता खराब होती है। शारीरिक गतिविधियां कम होने से मोटापा, तनाव और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ता है। पर्याप्त नींद न मिलने से चिड़चिड़ापन, गुस्सा और मानसिक थकान भी बढ़ सकती है।


बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए चेतावनी

विशेषज्ञों के अनुसार अकेलेपन की समस्या केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। बड़े भी डिजिटल दुनिया के कारण भावनात्मक दूरी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में परिवार के बड़े सदस्यों को खुद स्क्रीन का उपयोग सीमित कर बच्चों के लिए सकारात्मक उदाहरण बनना चाहिए।


डिजिटल सनसेट अपनाना हो सकता है फायदेमंद

मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए विशेषज्ञ 'डिजिटल सनसेट' अपनाने की सलाह दे रहे हैं। कह रहे है कि मोबाइल और स्क्रीन का उपयोग सीमित करें।

रोजाना कुछ समय परिवार के साथ बिना मोबाइल के बिताएं।

सोने से पहले 30-40 मिनट कोई शारीरिक गतिविधि करें, जैसे टहलना, साइकिल चलाना या कोई खेल।

सोने से पहले कॉफी और कैफीनयुक्त पेय से बचें।

रात का भोजन समय पर करें।

सोने से पहले किताब पढ़ें, डायरी लिखें या परिवार के साथ बातचीत करें।


क्या होंगे इसके फायदे?

परिवार के बीच संवाद और भावनात्मक जुड़ाव बढ़ेगा।

बच्चों को अपनी बातें साझा करने का अवसर मिलेगा।

स्क्रीन पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी।

तनाव, गुस्सा और नकारात्मक भावनाओं में कमी आएगी।

अच्छी नींद और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य मिलेगा।


विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही सबसे बड़ा समाधान है। यदि हम स्क्रीन और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बना लें, तो मानसिक शांति, रिश्तों की मजबूती और जीवन की वास्तविक खुशी दोबारा हासिल की जा सकती है।

टैग्स