1st Bihar Published by: First Bihar Updated Tue, 04 Nov 2025 09:03:56 AM IST
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Mokama Assembly Election : बिहार की मोकामा विधानसभा सीट चुनावी सरगर्मी के बीच सुर्खियों में है। यह सीट सिर्फ एक क्षेत्रीय लड़ाई नहीं रही, बल्कि अब यह राज्य की राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुकी है। मोकामा सीट पर होने वाला यह चुनाव केवल संख्या बल का खेल नहीं, बल्कि यह एक बड़े नेता की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है, जो इसे सबसे ‘हॉट सीट’ बना देता है।
घटना से उठे सवाल और बदली सियासत की हवा
पूरी कहानी की शुरुआत 30 अक्टूबर की शाम से होती है, जब मोकामा में जनसुराज समर्थकों और अनंत सिंह समर्थकों के बीच टकराव की घटना सामने आती है। इस झड़प में दुलारचंद यादव नामक शख्स की मौत हो जाती है, जो जनसुराज का समर्थक था। इस घटना के बाद न केवल मोकामा बल्कि आसपास के इलाकों में भी आक्रोश भड़क उठता है। खासकर पिछड़ा वर्ग और यादव समाज के लोग इस घटना के खिलाफ सड़कों पर उतर आते हैं। दुलारचंद यादव की शव यात्रा के दौरान एक विशेष जाति को लेकर किए गए अपशब्दों ने इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ गया।
इस घटना के बाद जेडीयू के प्रत्याशी, जिन पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा, उन्हें जेल जाना पड़ा। ऐसे वक्त में जेडीयू के अंदर संकट का माहौल पैदा हो गया कि अब चुनावी प्रचार कैसे होगा। इसी बीच मैदान में आते हैं ललन सिंह—जेडीयू के बड़े नेता और नीतीश कुमार के सबसे खास सिपहसालार। ललन सिंह को अक्सर पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता है, और इस मौके पर उनका सक्रिय होना यह संकेत देता है कि यह लड़ाई अब सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक वर्चस्व की जंग बन चुकी है।
अगड़ा बनाम पिछड़ा: जातीय ध्रुवीकरण का नया दौर
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मोकामा में जो कुछ हुआ, वह बिहार के जातीय समीकरणों को भी नए सिरे से परिभाषित करता है। जब मुंगेर लोकसभा सीट पर चुनाव हुआ था, तो यहां अगड़ा बनाम पिछड़ा का रंग साफ दिखा था। ललन सिंह, जो खुद भूमिहार समाज से आते हैं, जेडीयू के टिकट पर मैदान में थे, वहीं राजद ने अशोक महतो की पत्नी को खड़ा किया था, जो पिछड़े वर्ग से थीं। चुनाव के दौरान अशोक महतो की ओर से दिए गए बयानों ने इस लड़ाई को सवर्ण बनाम पिछड़ा के मुद्दे पर केंद्रित कर दिया था।
अब मोकामा, जो इसी लोकसभा का हिस्सा है, एक बार फिर से उसी जातीय ध्रुवीकरण की चपेट में आ गया है। यहां की एक बड़ी आबादी भूमिहार समुदाय से जुड़ी है, लेकिन पिछड़ा वर्ग भी अपनी संख्या में कम नहीं है। ऐसे में इस सीट पर चुनाव सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि सामाजिक आधारों के ध्रुवीकरण का भी हो गया है। जेडीयू के प्रत्याशी और राजद के प्रत्याशी, दोनों ही इसी समुदाय से आते हैं, ऐसे में यह मुकाबला आगे और दिलचस्प हो गया है।
राजनीतिक समीकरणों का उलझा पहाड़
मोकामा विधानसभा क्षेत्र को भूमिहार बहुल इलाका माना जाता है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू की झोली में यह सीट नहीं आई थी। नतीजा यह हुआ था कि यहां भूमिहार समाज से आने वाले नेता पिछड़ गए थे, जबकि पिछड़ा वर्ग के प्रत्याशी ने बाजी मार ली थी। यह परिणाम राजनीतिक पंडितों को भी चौंका गया था, क्योंकि यहां के जातीय समीकरणों से यह उम्मीद नहीं की गई थी।
खास बात यह रही कि भले ही जेडीयू के समर्थक समुदाय का वोट बैंक मजबूत था, परंतु चुनाव के समय उस समुदाय के बड़े नेता क्षेत्र में सक्रिय रहने के बावजूद भी राजनीतिक माहौल बराबरी का नहीं बन पाया। अनंत सिंह, जो इस क्षेत्र के बड़े चेहरों में से एक हैं, पेरोल पर आने के बाद क्षेत्र में घूमे, लेकिन चुनावी समीकरण उनके पक्ष में नहीं बन पाए।
अब की स्थिति देखें तो हालांकि मामला विधानसभा चुनाव का है, लेकिन जातीय माहौल पहले से कहीं अधिक पेचीदा है। खासकर दुलारचंद यादव की हत्या के बाद पिछड़ा वर्ग के भीतर आक्रोश दिखा, और यह ध्रुवीकरण का सीधा असर चुनावी गणित पर पड़ रहा है। अब सवाल यह है कि क्या जेडीयू इस वर्ग को अपने पक्ष में रख पाएगी, या ये वोट खिसक कर राजद या जनसुराज की तरफ चले जाएंगे?
ललन सिंह का ‘मुरेठा बांधना’: विजय का संकल्प या हार का भय?
जब जेडीयू के सामने यह संकट खड़ा हुआ, तो ललन सिंह ने मैदान संभाला। उनका ‘मुरेठा बांधना’ महज एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था। यह एक संदेश था कि पार्टी अब पूरी ताकत से इस चुनाव में उतरने वाली है। यह मुरेठा सिर्फ प्रचार का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सम्मान और आत्मसम्मान की ललकार भी थी। संदेश साफ था—जेडीयू किसी भी हाल में यह सीट हारना नहीं चाहती। क्योंकि यह सीट हारना केवल आंकड़ों में एक सीट कम होना नहीं, बल्कि नीतीश कुमार और जेडीयू की साख को सीधी चुनौती होगी।
चुनौती यह भी है कि राजद के प्रत्याशी भी उसी समुदाय से हैं, जिस पर अभी राजनीतिक हलचलें केंद्रित हैं। ऐसे में वोट का ध्रुवीकरण इस बार एकतरफा नहीं होगा, और हर उम्मीदवार को अपनी सही रणनीति बनाकर मैदान में उतरना होगा।
चुनावी समीकरणों का बदलता चेहरा
मोकामा की यह लड़ाई आने वाले दिनों में बिहार की राजनीतिक रणनीति का भविष्य भी तय कर सकती है। अगर पिछड़ा वर्ग का वोट एकतरफा नहीं जाता है और भूमिहार वर्ग भी अपने पारंपरिक रुख से हटता है, तो मोकामा का परिणाम एक नया राजनीतिक संदेश दे सकता है। यह संदेश सिर्फ इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की बाकी सीटों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
गौर करने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह सीट राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा की युद्धभूमि बनती जा रही है। जातीय गोलबंदी के साथ-साथ विकास, रोजगार, शिक्षा और स्थानीय मुद्दों ने भी सर उठाना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दलों की कोशिश होगी कि वे भावनाओं के साथ-साथ मुद्दों को भी लोगों के बीच मजबूती से रखें।
क्या मोकामा की जंग बनेगी नीतीश के लिए ‘अग्नि परीक्षा’?
मोकामा विधानसभा की लड़ाई किसी एक प्रत्याशी या एक पार्टी की नहीं रह गई है। यह लड़ाई बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकती है। यह चुनाव बिहार के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक, ललन सिंह की रणनीति, नीतीश कुमार के नेतृत्व की साख और जनता के मन की बात को परखने का अवसर बन गया है।
जबकि राजद और जनसुराज इस सीट पर अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं, बीजेपी और जेडीयू भी साथ खड़े दिखना चाहेंगे ताकि पिछड़ा और अगड़ा दोनों समुदायों में संतुलन कायम रहे। अब देखना यह है कि क्या जेडीयू मोकामा को अपने पाले में रख पाने में सफल होती है, या यह सीट एक बार फिर जातीय समीकरणों के भंवर में फंसकर किसी और की झोली में चली जाती है।
एक बात तो तय है कि मोकामा की यह लड़ाई बिहार के चुनावी इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगी—जहां जाति, जातीय भावनाएं, राजनीतिक रणनीति और जनता का निर्णय सभी मिलकर तय करेंगे कि इस ‘हॉट सीट’ पर कौन बनेगा बाजीगर।