1st Bihar Published by: First Bihar Updated Thu, 13 Nov 2025 09:54:30 AM IST
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Bihar Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। मंगलवार को राज्य के 20 जिलों की 122 सीटों पर दूसरे चरण का मतदान खत्म होने के बाद यह तय है कि इस चरण को न केवल सत्ता की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है, बल्कि यह कई क्षेत्रीय दलों के लिए “अस्तित्व की लड़ाई” भी बन गया है। जनता के मन में एक बार फिर वही सवाल गूंज रहा है — क्या सत्ता में वापसी होगी या बदलाव की बयार चलेगी?
महागठबंधन बनाम एनडीए: दूसरा चरण निर्णायक
दूसरे चरण के मतदान में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और विपक्षी महागठबंधन (एमजीबी) के बीच सीधा मुकाबला है। एनडीए की ओर से भारतीय जनता पार्टी (BJP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), हम (HAM) समेत दो अन्य पार्टी भी मैदान में हैं, जबकि विपक्ष की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और वामदल (CPI, CPI(M), CPI(ML)) विकासशील इंसान पार्टी (VIP) प्रमुख दावेदार हैं।
इस चरण में कई ऐसी सीटें हैं जो पारंपरिक रूप से या तो आरजेडी के कब्जे में रही हैं या जेडीयू की मजबूत पकड़ रही है। लेकिन इस बार के समीकरण काफी बदले हुए हैं। जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ युवा और महिला मतदाता भी इस बार के चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
छोटे दलों की बड़ी परीक्षा
दूसरे चरण में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM), विकासशील इंसान पार्टी (VIP), राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और AIMIM जैसे दलों की साख दांव पर लगी हुई है। इन दलों के लिए यह चरण राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM), जिसे जीतन राम मांझी नेतृत्व दे रहे हैं, एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। पिछली बार मांझी की पार्टी को सीमित सफलता मिली थी, लेकिन इस बार वे अपने राजनीतिक प्रभाव को फिर से स्थापित करने की कोशिश में हैं।
विकासशील इंसान पार्टी (VIP), मुकेश सहनी के नेतृत्व में, महागठबंधन के लिए ‘निषाद वोट बैंक’ को साधने की जिम्मेदारी निभा रही है। सहनी के लिए यह चुनाव ‘सत्ता में हिस्सेदारी’ बरकरार रखने की जंग है।राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और AIMIM जैसी पार्टियां भी सीमांचल और उत्तर बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पिछली बार सीमांचल में अच्छा प्रदर्शन किया था और अब वह फिर से उस प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती के सामने है।
महागठबंधन को वाम दलों से उम्मीद
महागठबंधन के लिए इस बार कांग्रेस और वाम दलों की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। पिछली विधानसभा में वाम दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था और आरजेडी को 20 से अधिक सीटें दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खासकर CPI(ML) की मजबूती ने तेजस्वी यादव को विपक्ष का चेहरा बनाए रखने में मदद की थी।
तेजस्वी यादव का पूरा फोकस इस बार मतदाताओं को “परिवर्तन” का संदेश देने पर है। रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दों को वे लगातार उठा रहे हैं। वहीं, कांग्रेस इस बार अपने अस्तित्व को बचाने और बेहतर सीटें निकालने के लिए मेहनत कर रही है।
एनडीए की रणनीति: ‘चिराग फैक्टर’ फिर बना चर्चा का विषय
दूसरी ओर, एनडीए के लिए इस बार सबसे बड़ा फैक्टर ‘चिराग पासवान’ बनकर उभरा है। हालांकि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की भूमिका औपचारिक रूप से गठबंधन में स्पष्ट नहीं है, लेकिन चिराग पासवान का प्रभाव कई सीटों पर महसूस किया जा रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में चिराग की पार्टी ने अलग राह चुनी थी और केवल एक सीट जीत सकी थी, लेकिन उन्होंने कई सीटों पर जेडीयू को नुकसान पहुंचाया था। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में एलजेपी (रामविलास) ने सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी ताकत का अहसास कराया। यही वजह है कि इस बार एनडीए के भीतर भी “चिराग फैक्टर” को लेकर चर्चा तेज है।
चुनाव आयोग की सख्ती और मतदाता उत्साह
राज्य के सभी मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं। पैरामिलिट्री बलों की तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी कैमरों से निगरानी भी की जा रही है। मतदाताओं में इस बार भारी उत्साह देखा जा रहा है। सुबह से ही कई बूथों पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी खास तौर पर उल्लेखनीय रही।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चरण में मतदान प्रतिशत और रुझान दोनों ही बिहार की सत्ता की दिशा तय करेंगे। पहले चरण में जहां ग्रामीण इलाकों में महागठबंधन को बढ़त मिलती दिखी थी, वहीं दूसरे चरण में शहरी क्षेत्रों और पिछड़े वर्ग के इलाकों में एनडीए का प्रदर्शन अहम रहेगा।
सत्ता की कुंजी दूसरे चरण में
दूसरे चरण का यह चुनाव वास्तव में “सत्ता की कुंजी” बन गया है। 122 सीटों पर होने वाला यह मतदान बिहार की अगली सरकार का रुख तय कर सकता है। जहां एक ओर तेजस्वी यादव युवा वोटरों पर भरोसा जता रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने “काम और अनुभव” के दम पर मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश में हैं।
छोटे दलों के लिए यह मौका है कि वे अपने जनाधार को दोबारा स्थापित करें और बिहार की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखें। अब देखना यह है कि 14 नवंबर को मतगणना के दिन जनता किसे सत्ता की बागडोर सौंपती है — अनुभव को या बदलाव को।