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Bihar Election 2025 : अल्लाबरू ने पूरी तरह से डुबो दी कांग्रेस की लुटिया ! 3 महीने सर्वे के बाद भी तेजस्वी से नहीं ले पाए मजबूत सीट; दो सीटिंग भी छोड़नी पड़ी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस ने पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने की योजना बनाई थी। चार माह तक सर्वे, फीडबैक और वार रूम रणनीति के बावजूद पार्टी मजबूत सीटें नहीं ले सकी और अपनी दो सीटिंग सीटें भी गंवा बैठी।

Bihar Election 2025 : अल्लाबरू ने पूरी तरह से डुबो दी कांग्रेस की लुटिया ! 3 महीने सर्वे के बाद भी तेजस्वी से नहीं ले पाए मजबूत सीट; दो सीटिंग भी छोड़नी पड़ी
Tejpratap
Tejpratap
5 मिनट

Bihar Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार कांग्रेस ने भी तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ी। पार्टी ने चार महीने पहले से ही मिशन मोड में काम शुरू कर दिया था। जिलाध्यक्षों से फीडबैक लिया गया, जमीनी सर्वे कराया गया, और पटना के गर्दनीबाग विधायक आवास स्थित वार रूम में रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी संभालने वालों ने तीन महीने पहले से एक्टिव मोड में काम शुरू कर दिया। लेकिन जब सीट बंटवारे का समय आया, तो सारी मेहनत बेअसर साबित हुई कांग्रेस न सिर्फ सहयोगियों से एक भी मजबूत सीट हासिल नहीं कर सकी, बल्कि अपनी दो मौजूदा सीटें भी गंवा बैठी।


तीन महीने का सर्वे, फिर भी नतीजा शून्य

कांग्रेस ने इस बार चुनाव की तैयारी के लिए 3 से 4 महीने तक लगातार सर्वे कराया। इसमें पार्टी ने उन सीटों की पहचान की, जहां उसका संगठन मजबूत है और जीत की संभावना अधिक थी। जिलाध्यक्षों से फीडबैक लेकर उन इलाकों की रिपोर्ट बनाई गई, जहां स्थानीय समीकरण पार्टी के पक्ष में थे। राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” ने भी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी थी। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने खुलकर दावा किया था कि इस बार कांग्रेस अपने कोटे में मजबूत सीटों पर चुनाव लड़ेगी और पिछले बार से बेहतर प्रदर्शन करेगी।


लेकिन जब सीट बंटवारे की सूची सामने आई, तो कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता दोनों निराश दिखे। न सिर्फ सहयोगियों से कोई नई सीट मिली, बल्कि दो मौजूदा सीटें महाराजगंज और जमालपुरभी गंवानी पड़ीं। दोनों जगहों पर कांग्रेस के मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं मिला, और सीटें महागठबंधन के अन्य घटकों को दे दी गईं।


70 से घटकर 61 सीटों पर सिमटी कांग्रेस

2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इस बार पार्टी का कोटा घटकर 61 सीटें रह गया है। इनमें से अधिकांश वही पुरानी सीटें हैं, जहां पार्टी ने पिछली बार चुनाव लड़ा था। जबकि 13 सीटें ऐसी हैं जो पार्टी ने छोड़ दी हैं, जिनमें से कई पर कांग्रेस का पिछला प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा था।


छोड़ी गई सीटों में बिहारशरीफ, बनमनखी और कुम्हरार जैसी नई सीटें जरूर जोड़ी गई हैं, लेकिन इन पर कांग्रेस की जमीनी पकड़ अभी कमजोर मानी जा रही है। वहीं जिन सीटों को छोड़ा गया है, वहां स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी देखी जा रही है।


महागठबंधन में ‘दोस्ताना मुकाबला’ बना सिरदर्द

महागठबंधन के भीतर इस बार 11 सीटों पर सहयोगी दलों के बीच सीधा टकराव की स्थिति है। इनमें 10 सीटों पर कांग्रेस अपने ही सहयोगियों से घिरी हुई है। सबसे ज्यादा राजद-कांग्रेस के बीच पांच सीटों पर और भाकपा-कांग्रेस के बीच चार सीटों पर आमने-सामने की लड़ाई है। एक सीट पर कांग्रेस का मुकाबला आईआईपी (इंडियन इंटीग्रिटी पार्टी) से है।


ये “दोस्ताना मुकाबले” न सिर्फ गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहे हैं, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। कई जगहों पर जमीनी स्तर पर यह टकराव चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है।


राहुल गांधी की यात्रा से जोश तो आया, लेकिन तालमेल में कमी

राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” ने निश्चित रूप से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा की। लंबे समय बाद बिहार में कांग्रेस के दफ्तरों और जिलों में कार्यकर्ता सक्रिय दिखे। यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने बेरोजगारी, महंगाई और किसानों के मुद्दे को प्रमुखता दी, जिससे स्थानीय स्तर पर पार्टी का जनसंपर्क बढ़ा।


फिर भी, सीट बंटवारे के वक्त कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व सहयोगियों से तालमेल बिठाने में कमजोर साबित हुआ। आरजेडी और वाम दलों ने अपने संगठन और जनाधार के दम पर सीटें खींच लीं, जबकि कांग्रेस की मांगें कागजों में ही रह गईं।


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कांग्रेस के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। एक ओर पार्टी के पास जोश और तैयारी तो है, लेकिन सीट बंटवारे की गणित में वह पिछड़ गई है। संगठन मजबूत करने और ग्राउंड लेवल पर पकड़ बनाने के बावजूद कांग्रेस मजबूत सीटें हासिल नहीं कर सकी।


अब देखना यह होगा कि जिन 61 सीटों पर वह मैदान में है, वहां उसका प्रदर्शन कितना प्रभावी रहता है। राहुल गांधी की सक्रियता और प्रदेश नेतृत्व की मेहनत क्या वाकई मतदाताओं में असर डाल पाएगी या कांग्रेस फिर उसी पुराने प्रदर्शन तक सीमित रह जाएगी — यह तो नतीजे ही तय करेंगे।

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