1st Bihar Published by: First Bihar Updated Sun, 09 Nov 2025 08:28:05 AM IST
- फ़ोटो
Bihar Chunav: बिहार की राजनीति को समझना हो तो जाति समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दशकों से यह राज्य उसी जातिगत ताने-बाने में उलझा रहा है, जहां अक्सर बड़ी जातियों की तुलना में छोटी जातियां—जैसे कुशवाहा, मल्लाह, मांझी, धनुक, पासवान आदि—अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान बनाकर एक सशक्त वोट बैंक के रूप में उभरी हैं। लेकिन इस परंपरा को चुनौती देने वाले नेता के रूप में उभरे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने पिछले दो दशकों में अपनी जाति कुर्मी की सीमाओं से ऊपर उठकर खुद को सर्वमान्य पिछड़ा नेता के रूप में स्थापित किया है।
नीतीश की ‘सामाजिक इंजीनियरिंग’ की सफलता
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर केवल विकास के नारों या सुशासन की छवि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सोशल इंजीनियरिंग मॉडल की सफलता की कहानी भी है। बिहार की कुल आबादी में कुर्मी जाति का हिस्सा करीब 3% है, लेकिन नीतीश ने इस छोटे से आधार को अति-पिछड़ों (EBCs) और महिलाओं के बड़े समूह से जोड़कर एक मजबूत जनाधार खड़ा किया। उनकी यह रणनीति सकारात्मक जाति राजनीति कही जा सकती है — जिसमें उन्होंने EBC, दलित और महिला वर्ग को सशक्त बनाकर उन्हें सत्ता की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।
2006 में नीतीश सरकार ने पंचायतों में EBC के लिए 20% आरक्षण लागू कर राजनीतिक भागीदारी का दरवाजा खोला। इसके बाद 2010 में उन्होंने EBC उद्यमिता योजना शुरू की, जिसके तहत छोटे व्यापार के लिए 10 लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है। इन नीतियों का असर इतना गहरा रहा कि आज EBC वर्ग नीतीश कुमार का सबसे स्थायी वोट बैंक बन गया है।
‘विकास’ बनाम ‘जाति’ की नई बहस
रिपोर्ट के अनुसार, सीमांचल से लेकर मगध तक नीतीश कुमार के प्रति वफादारी की झलक स्पष्ट दिखती है। पटना से कटिहार तक के क्षेत्रों में मतदाताओं से बातचीत में यह भाव साफ झलकता है कि वे जाति नहीं, विकास पर वोट करेंगे। बाढ़ क्षेत्र के एक मतदाता ने कहा, “जो हमको सड़क दिया, बिजली दिया, सुरक्षा दिया, उसको नहीं वोट देंगे तो किसे देंगे?” यह बयान बताता है कि बिहार की नई राजनीति में विकास का मुद्दा जाति से टकरा नहीं रहा, बल्कि उसके साथ मिलकर ‘विकास आधारित जातीय राजनीति’ का नया रूप गढ़ रहा है।
विपक्षी समीकरण और नीतीश की चुनौतियां
हालांकि नीतीश की यह सामाजिक एकजुटता अब पहले जैसी मजबूत नहीं दिखती। आरजेडी के तेजस्वी यादव यादव-मुस्लिम समीकरण के भरोसे NDA के गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश में हैं। चिराग पासवान अपने दुसाध समुदाय के नेता के रूप में युवा वोटरों को आकर्षित करने में लगे हैं। वहीं बीजेपी के गिरिराज सिंह और सम्राट चौधरी क्रमशः भूमिहार और कुशवाहा वोटों पर दावा ठोक रहे हैं।
इन सबके बीच, कुछ इलाकों में ‘नीतीश थकान’ (Nitish Fatigue) भी देखने को मिल रही है। जमुई में कुछ चंद्रवंशी (कहार) समुदाय के लोग BPSC लाठीचार्ज जैसी घटनाओं से नाराज हैं। एक ई-रिक्शा चालक ने कहा, “अब बदलाव चाहिए, तेजस्वी को मौका मिलना चाहिए।” यहां आरजेडी प्रत्याशी शमशाद आलम को मुस्लिम और यादव वोटों के साथ-साथ अन्य पिछड़े समुदायों का भी समर्थन मिल सकता है, जिससे वह बीजेपी की श्रेयसी सिंह को कड़ी चुनौती दे सकते हैं।
जातीय गणित में नीतीश की पकड़ अभी भी मजबूत
बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 के अनुसार, राज्य में EBC की आबादी करीब 36% है, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यह वही वर्ग है जो अब तक नीतीश कुमार का सबसे बड़ा स्तंभ रहा है। मल्लाह, तेली, नाई, बिंद, लोहार, कुहार, धनुक, राजभर जैसी जातियां नीतीश को एक ‘अपना नेता’ मानती हैं।
धनुक समुदाय के अलावा पासवान और मांझी जैसी दलित जातियों के लोग भी नीतीश के प्रति एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि “नीतीश ने गरीबों की आवाज़ को पंचायत तक पहुंचाया।”
बिहार के इस चुनाव में मुकाबला सिर्फ एनडीए बनाम महागठबंधन नहीं, बल्कि ‘नीतीश मॉडल बनाम जातीय राजनीति’ का भी है। एक ओर तेजस्वी यादव और चिराग पासवान जैसे युवा नेता अपनी जाति आधारित राजनीति को मजबूत कर रहे हैं, वहीं नीतीश कुमार अब भी उस पुरानी रेखा को तोड़ने का दावा करते हैं जिसमें जाति ही पहचान थी।
हालांकि, उनके सामने चुनौती दोहरी है — एक तरफ सत्ता विरोधी लहर और दूसरी ओर EBC वर्ग में बढ़ती आकांक्षाएं। अगर वे इस वर्ग का विश्वास बनाए रखने में सफल होते हैं, तो ‘विकासपुरुष नीतीश’ की राजनीति एक बार फिर जातीय दीवारों को पार कर सकती है। लेकिन अगर यह वोट बैंक खिसक गया, तो 2025 का चुनाव बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिख सकता है — जहां विकास और जाति की जंग फिर एक बार आमने-सामने होगी।