India Energy Crisis News: देश के करोड़ों परिवारों के लिए रसोई गैस को लेकर चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है. भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में मई 2026 के दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की कुल ईंधन खपत सालाना आधार पर 6.5 प्रतिशत घटकर 19.93 मिलियन टन रह गई है, जबकि मई 2025 में यह आंकड़ा 21.3 मिलियन टन था.
सबसे ज्यादा चिंता की बात एलपीजी यानी रसोई गैस की मांग में आई भारी गिरावट है. मई 2026 में एलपीजी की खपत 20.5 प्रतिशत तक घट गई. पिछले साल मई में जहां देश में 2.68 मिलियन टन एलपीजी की खपत हुई थी, वहीं इस साल यह घटकर केवल 2.13 मिलियन टन रह गई. यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत देती है कि महंगाई और नई नीतियों के कारण लाखों परिवार गैस के उपयोग में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं.
सरकार के नए नियमों का भी दिखा असर
एलपीजी की मांग में गिरावट के पीछे सरकार की हालिया नीतियों को भी बड़ी वजह माना जा रहा है. सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मिलने वाले सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या 9 से घटाकर सिर्फ 4 कर दी है. इसके अलावा गैस सिलेंडर की बुकिंग से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं. इन फैसलों का असर सीधे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ा है.
पहले उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को ज्यादा संख्या में सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलते थे, जिससे सालभर का खर्च कुछ हद तक नियंत्रित रहता था. लेकिन अब सब्सिडी सीमित होने के कारण कई परिवार गैस की खपत कम करने लगे हैं. जानकारों का मानना है कि यही वजह है कि एलपीजी की मांग में इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली है.
तेल कंपनियों पर बढ़ा आर्थिक दबाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. सरकारी तेल कंपनियों के मुताबिक वर्तमान में उन्हें प्रत्येक एलपीजी सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है. यही कारण है कि सरकार भी सब्सिडी का बोझ कम करने की दिशा में कदम उठा रही है.
हालांकि इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और उज्ज्वला योजना से जुड़े परिवारों के लिए रसोई गैस का खर्च पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है.
विमान ईंधन की मांग स्थिर, निर्माण क्षेत्र में सुस्ती
एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी विमानन ईंधन की खपत लगभग स्थिर बनी रही.मई में इसकी खपत करीब 7.83 लाख टन दर्ज की गई.
वहीं सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले बिटुमेन की मांग में 39.4 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा नेफ्था की खपत भी 29.4 प्रतिशत कम हो गई. इन आंकड़ों को निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों में आई सुस्ती का संकेत माना जा रहा है.
पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई चिंता
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े जोखिमों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है.भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है.ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश के ईंधन बाजार पर पड़ता है.
रिफाइंड ऑयल एक्सपोर्ट में भी आई कमी
सिर्फ घरेलू खपत ही नहीं, भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी गिरावट दर्ज की गई है.कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत का रिफाइंड ऑयल एक्सपोर्ट घटकर 9.37 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो पिछले महीने की तुलना में 3.6 प्रतिशत कम है.




