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Bihar Politics : राबड़ी आवास विवाद बना सियासी संग्राम, सरकारी बंगले पर कब्जे को लेकर आमने-सामने NDA और RJD; अब सुरक्षा में तैनात जवान को भी वापस भेजा

"राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर बिहार में सियासी संग्राम छिड़ गया है। BJP नियमों की बात कर रही है तो RJD इसे सम्मान और राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बता रही है। आखिर कौन जीतेगा इस बंगला विवाद की लड़ाई?"

Bihar Politics : राबड़ी आवास विवाद बना सियासी संग्राम, सरकारी बंगले पर कब्जे को लेकर आमने-सामने NDA और RJD; अब सुरक्षा में तैनात जवान को भी वापस भेजा
Tejpratap
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Bihar Politics : पटना में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर छिड़ा विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है। एक तरफ राबड़ी देवी स्पष्ट कर चुकी हैं कि वह वर्तमान सरकारी आवास खाली नहीं करेंगी, वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर से यह संदेश दिया जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति को सरकारी संपत्ति पर स्थायी अधिकार नहीं मिल सकता।


उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि सरकारी आवास किसी की निजी संपत्ति नहीं है और नियमों के अनुसार उसका उपयोग होना चाहिए। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में बहस और तेज हो गई है।


इस बीच राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ओर से उन नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सूची जारी की गई है, जो मंत्री पद पर नहीं होने के बावजूद सरकारी आवासों में रह रहे हैं। राजद का दावा है कि कई पूर्व मंत्री, सांसद और पूर्व विधायक ऐसे आवासों का उपयोग कर रहे हैं जिनका निर्माण मूल रूप से मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए किया गया था।


हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। भवन निर्माण मंत्री लेशी सिंह का कहना है कि जिन लोगों के नाम सूची में शामिल किए गए हैं, वे नियमों के तहत निर्धारित बाजार दर पर किराया देकर सरकारी आवासों में रह रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी आवासों के आवंटन में किराया भी एक वैध आधार है और सरकार अपने विवेकाधिकार के तहत ऐसे निर्णय ले सकती है। मंत्री ने यह भी कहा कि कोई भी सामान्य व्यक्ति केवल किराया जमा कर मंत्री स्तर के सरकारी आवास में रहने का अधिकार नहीं पा सकता। इसके लिए सरकार की स्वीकृति और निर्धारित प्रक्रिया आवश्यक होती है।


दरअसल पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब राबड़ी देवी को आवंटित वर्तमान आवास को भाजपा कोटे के मंत्री नंदकिशोर राम के नाम आवंटित कर दिया गया। सरकार का कहना है कि राबड़ी देवी को वैकल्पिक सरकारी आवास उपलब्ध कराया जा चुका है, इसलिए उन्हें वर्तमान बंगला खाली करना चाहिए।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अब केवल आवास तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा इस मुद्दे को अनुसूचित जाति समुदाय से जोड़ते हुए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि एक दलित मंत्री को आवंटित आवास खाली नहीं किया जा रहा है। वहीं राजद इसे पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के सम्मान से जोड़कर जनता के बीच ले जाना चाहता है।


राजद की रणनीति यह भी मानी जा रही है कि यदि सरकार बलपूर्वक आवास खाली कराती है तो उसे महिला विरोधी और राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया जा सके। दूसरी ओर सरकार यह दिखाना चाहती है कि कानून और नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। इसी दौरान राज्य में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी चर्चा में है। कई जगहों पर गरीबों की झोपड़ियां हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं, लेकिन राजनीतिक और मीडिया विमर्श का केंद्र फिलहाल राबड़ी देवी का सरकारी आवास बना हुआ है।


वैसे बिहार में सरकारी आवासों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। लंबे समय से सत्ता और सरकारी बंगलों का आकर्षण राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रहा है। चुनाव जीतकर पटना पहुंचने वाले कई जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता बेहतर और बड़े सरकारी आवास की तलाश होती रही है।


पहले के दौर में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद कई नेता और उनके समर्थक पराजित नेताओं या पूर्व मंत्रियों के सरकारी आवासों पर कब्जा जमाने की कोशिश करते थे। हालांकि समय के साथ आवास आवंटन की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हुई और विधानसभा क्षेत्र संख्या के आधार पर आवास आवंटन की व्यवस्था लागू की गई।


फिर भी बड़े और सुविधाजनक सरकारी आवासों की मांग कम नहीं हुई है। कई पूर्व मंत्री, जो अब केवल विधायक हैं, उन्हें विशेष व्यवस्था के तहत अतिरिक्त आवास उपलब्ध कराए गए हैं। ऐसे मामलों में एक आवास विधायक के रूप में मिलता है, जबकि दूसरे आवास के लिए किराया देना पड़ता है।


राजनीति में सत्ता और प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में सरकारी आवासों का महत्व हमेशा रहा है। यही वजह है कि राबड़ी देवी के आवास का विवाद केवल एक बंगले का मामला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश, सामाजिक समीकरण और सत्ता संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद कानूनी समाधान तक पहुंचता है या फिर राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रहता है।