1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 10, 2026, 7:51:06 AM
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Bihar politics : बिहार की सियासत में इन दिनों मुख्यमंत्री Nitish Kumar के बेटे Nishant Kumar की राजनीति में एंट्री को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। 8 मार्च को निशांत कुमार ने औपचारिक रूप से Janata Dal (United) की सदस्यता ग्रहण की, जिसके बाद विपक्ष लगातार मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहा है। विपक्ष का कहना है कि जो नीतीश कुमार अब तक अन्य दलों को “परिवार की पार्टी” कहकर आलोचना करते रहे, अब वही खुद अपने बेटे को राजनीति में आगे बढ़ा रहे हैं।
दरअसल, बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को लंबे समय से साफ-सुथरी और सिद्धांत आधारित राजनीति करने वाले नेता के रूप में देखा जाता रहा है। उन्होंने कई मौकों पर परिवारवाद की राजनीति का विरोध किया और इसे लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक बताया। लेकिन अब उनके बेटे के सक्रिय राजनीति में आने से राजनीतिक गलियारों में नए सवाल उठने लगे हैं।
2009 में बनाया था खास नियम
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस पूरे मामले को 2009 के उपचुनाव के दौरान बनाए गए उस नियम से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसे खुद नीतीश कुमार ने लागू किया था। उस समय उन्होंने साफ कहा था कि जदयू के किसी भी मंत्री, सांसद, विधायक या वरिष्ठ नेता के रिश्तेदार को पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
उस दौर में यह फैसला काफी चर्चा में रहा था, क्योंकि बिहार की राजनीति में परिवारवाद आम बात मानी जाती रही है। लेकिन नीतीश कुमार ने एक अलग संदेश देने के लिए यह सख्त नियम लागू किया था। उन्होंने कहा था कि राजनीति में अवसर योग्यता और जनसेवा के आधार पर मिलना चाहिए, न कि पारिवारिक संबंधों के आधार पर।
इतना ही नहीं, उस समय कई ऐसे मामले सामने आए थे, जहां जदयू से जुड़े नेताओं के रिश्तेदार चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनके नामांकन को स्वीकार नहीं किया। बताया जाता है कि कुछ नेताओं के रिश्तेदारों का नामांकन तक रद्द कर दिया गया था। इस कदम को उस समय सुशासन और सिद्धांत आधारित राजनीति की मिसाल के रूप में पेश किया गया था।
विपक्ष ने उठाए सवाल
अब जब निशांत कुमार ने जदयू की सदस्यता ले ली है, तो विपक्ष इस पुराने नियम को याद दिलाकर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि नीतीश कुमार ने जिस परिवारवाद के खिलाफ लंबे समय तक राजनीतिक लड़ाई लड़ी, अब वही स्थिति उनके अपने घर में दिखाई दे रही है।
कुछ विपक्षी नेताओं का यह भी कहना है कि मुख्यमंत्री को साफ करना चाहिए कि क्या अब उनकी पार्टी में परिवार के लोगों के राजनीति में आने को लेकर नीति बदल गई है। विपक्ष का दावा है कि इससे जदयू की उस छवि पर असर पड़ सकता है, जिसे वर्षों से परिवारवाद के विरोधी दल के रूप में पेश किया जाता रहा है।
क्या बदली है राजनीतिक रणनीति?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, निशांत कुमार की सक्रियता को सिर्फ परिवारवाद के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं हो सकती। कई विश्लेषकों का मानना है कि बदलते राजनीतिक हालात में जदयू अपनी अगली पीढ़ी के नेतृत्व को तैयार करने की दिशा में कदम उठा सकती है।
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे में यह भी चर्चा थी कि निशांत कुमार की एंट्री भविष्य की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि वह सक्रिय चुनावी राजनीति में उतरेंगे या फिलहाल संगठनात्मक स्तर पर ही काम करेंगे।
नीतीश की सियासी छवि पर चर्चा
करीब दो दशकों से बिहार की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रहे नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में साफ-सुथरी छवि बनाए रखने की कोशिश की है। उनके समर्थक अक्सर यह दावा करते हैं कि इतने लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद उन पर व्यक्तिगत स्तर पर कोई बड़ा आरोप नहीं लगा है।
इसी वजह से 2009 में बनाया गया परिवारवाद विरोधी नियम भी उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन गया था। अब निशांत कुमार की जदयू में एंट्री के बाद एक बार फिर उसी नियम और उस दौर की राजनीति की चर्चा तेज हो गई है।
फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में जदयू इस मुद्दे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाती है और निशांत कुमार की भूमिका पार्टी और बिहार की राजनीति में किस तरह तय होती है। विपक्ष के सवालों और राजनीतिक बहस के बीच यह मुद्दा आने वाले समय में बिहार की सियासत में बड़ा विषय बन सकता है।