1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 05, 2026, 12:27:38 PM
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Bihar Politics : बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम आज बेहद प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता संभालने वाले नीतीश कुमार आज भले ही बिहार के सबसे अनुभवी और लोकप्रिय नेताओं में शामिल हों, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत उतनी आसान नहीं रही थी। दिलचस्प बात यह है कि अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दो विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आगे चलकर बिहार की राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभों में शामिल हो गए।
नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा की जड़ें छात्र आंदोलन और समाजवादी राजनीति में मिलती हैं। 1970 के दशक में जब देश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था, तब युवाओं के बीच राजनीति को लेकर एक अलग ही उत्साह था। वर्ष 1975 में पटना के गांधी मैदान में आयोजित एक बड़ी सभा में देश के प्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने छात्रों को संबोधित किया था। इस सभा में बड़ी संख्या में छात्र नेता मौजूद थे और कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी भी कई युवा कार्यकर्ताओं को दी गई थी। इन्हीं युवा नेताओं में एक नाम नीतीश कुमार का भी था।
नीतीश कुमार उसी दौर में चल रहे JP Movement से प्रभावित होकर सक्रिय राजनीति में आए। इस आंदोलन ने देश की राजनीति में कई बड़े नेताओं को जन्म दिया और नीतीश कुमार भी उन्हीं में से एक थे। छात्र राजनीति से निकलकर उन्होंने जनता के बीच अपनी पहचान बनानी शुरू की।
आपातकाल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देशभर में चुनाव हुए। इसी दौरान नीतीश कुमार ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। उस समय उनकी उम्र करीब 26 वर्ष थी। उन्होंने नालंदा जिले की हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया। उस समय उन्हें Janata Party ने अपना उम्मीदवार बनाया था।
हालांकि, अपने राजनीतिक जीवन के पहले ही चुनाव में नीतीश कुमार को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें हराने वाले उम्मीदवार कोई बड़े या स्थापित नेता नहीं थे, बल्कि भोला प्रसाद सिंह थे। यह मुकाबला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि भोला प्रसाद सिंह कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते थे।
दरअसल, जब नीतीश कुमार ने अपनी पत्नी मंजू कुमारी के साथ पटना में कोर्ट मैरिज की थी, तब जिस वीआईपी गाड़ी से वे अपनी पत्नी को लेकर रवाना हुए थे, उस गाड़ी को चलाने वाले व्यक्ति भोला प्रसाद सिंह ही थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कुछ वर्षों बाद यही दोनों लोग चुनावी मैदान में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बनेंगे। लेकिन राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं और ऐसा ही हुआ। शादी के लगभग चार साल बाद 1977 के चुनाव में भोला प्रसाद सिंह ने नीतीश कुमार को हरा दिया।
पहली हार के बावजूद नीतीश कुमार ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने राजनीति में सक्रिय रहना जारी रखा और अपने संगठनात्मक कामों के जरिए जनता के बीच अपनी पहचान बनाते रहे। इसके लगभग तीन साल बाद वर्ष 1980 में उन्होंने एक बार फिर हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
इस बार नीतीश कुमार Janata Party (Secular) के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन दूसरी बार भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और उन्हें फिर से हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में वे निर्दलीय उम्मीदवार अरुण कुमार सिंह से हार गए। कहा जाता है कि इस चुनाव में भी भोला प्रसाद सिंह का समर्थन अरुण कुमार सिंह को मिला था, जिसने मुकाबले को और कठिन बना दिया।
हालांकि लगातार दो चुनाव हारने के बावजूद नीतीश कुमार ने राजनीति से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने संगठन में सक्रिय रहते हुए जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। इसका परिणाम वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला।
1985 में नीतीश कुमार ने तीसरी बार हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और इस बार उन्होंने शानदार जीत दर्ज की। बताया जाता है कि उन्होंने करीब 21 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की। इसी जीत के साथ उनका राजनीतिक करियर मजबूती से आगे बढ़ने लगा।
इसके बाद नीतीश कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई और बाद में राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। संसद तक पहुंचने के बाद उन्होंने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं, जिनमें रेल मंत्रालय भी शामिल रहा।
केंद्रीय राजनीति में लंबा अनुभव हासिल करने के बाद नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया। आगे चलकर उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली और लंबे समय तक बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहे।
आज नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर यह बताता है कि शुरुआती असफलताएं किसी भी नेता के लिए अंत नहीं होतीं। दो चुनावों में हार का सामना करने के बावजूद उन्होंने धैर्य और संघर्ष के बल पर खुद को बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल कर लिया।