पटना : बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 75 साल की उम्र में गोवा स्थित अपने घर पर कार्डियक अरेस्ट के बाद उनका निधन हो गया। उनकी मौत की खबर सामने आते ही हिंदी सिनेमा से लेकर देशभर में उनके चाहने वालों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। नाना पाटेकर सिर्फ अपनी दमदार आवाज, तीखे संवाद और अलग तरह के अभिनय के लिए ही याद नहीं किए जाएंगे, बल्कि बिहार से उनका एक खास और भावनात्मक रिश्ता भी रहा है।
नाना पाटेकर का बिहार कनेक्शन सबसे ज्यादा उनकी फिल्म ‘अपहरण’ की वजह से चर्चा में आया। प्रकाश झा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नाना पाटेकर ने अजय देवगन के साथ अहम भूमिका निभाई थी। फिल्म की कहानी बिहार में पनपे अपहरण उद्योग, राजनीति और अपराध के गठजोड़ की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। इस फिल्म में बिहार को सिर्फ लोकेशन के तौर पर नहीं दिखाया गया, बल्कि यहां की राजनीति, अपराध, सत्ता और सामाजिक परिस्थितियों को कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया था।
‘अपहरण’ में नाना पाटेकर का किरदार और उनके संवाद आज भी दर्शकों को याद हैं। फिल्म ने उस दौर के बिहार की एक ऐसी तस्वीर पर्दे पर पेश की थी, जब अपहरण और बाहुबल की खबरें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनती थीं। यही वजह है कि नाना पाटेकर का नाम बिहार की उन फिल्मों से भी जुड़ गया, जिन्होंने राज्य की राजनीति और अपराध की कहानी को देश के सामने रखा।
लेकिन बिहार से नाना पाटेकर का रिश्ता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। जून 2020 में वह बिहार के दौरे पर भी आए थे। उस दौरान उन्होंने पटना, मोकामा घाट और कोइलवर में सीआरपीएफ के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। वह जवानों और किसानों से मिले थे और उनके साथ समय बिताया था। मोकामा में उन्होंने खादी भवन का दौरा किया और किसानों के साथ खेत में हल भी चलाया था।
इसी बिहार यात्रा के दौरान नाना पाटेकर पटना के राजीव नगर स्थित दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के घर भी पहुंचे थे। सुशांत की मौत के बाद नाना ने उनके पिता केके सिंह से मुलाकात की और परिवार को सांत्वना दी थी। उन्होंने सुशांत की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी थी। उस वक्त नाना पाटेकर का पटना पहुंचना काफी चर्चा में रहा था।
नाना पाटेकर की पहचान ऐसे अभिनेता की रही, जिनकी स्क्रीन पर मौजूदगी भर से दृश्य का असर कई गुना बढ़ जाता था। ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। उनकी संवाद अदायगी और भावनात्मक अभिनय ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे अलग कलाकारों में शामिल किया।
नाना का एक दूसरा पक्ष भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय रहा। वह किसानों और ग्रामीण समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय रहे। हाल के वर्षों में भी उनके किसान हितैषी काम और सादगी की चर्चा होती रही। उनके निधन के बाद सामने आ रही यादों में भी एक ऐसे कलाकार की तस्वीर उभर रही है, जो बड़े पर्दे का सितारा होने के बावजूद जमीन से जुड़ा रहा।
बिहार के लिए नाना पाटेकर का जाना इसलिए भी एक अलग मायने रखता है क्योंकि उनका जुड़ाव इस राज्य से पर्दे और निजी संवेदनाओं, दोनों स्तरों पर रहा। एक तरफ ‘अपहरण’ ने बिहार की उस दौर की कहानी को देशभर में पहुंचाया, तो दूसरी तरफ पटना आकर उन्होंने जवानों, किसानों और सुशांत सिंह राजपूत के परिवार से मुलाकात की।
आज जब नाना पाटेकर की अंतिम विदाई की खबर सामने आई है, तब बिहार के दर्शकों के लिए उनकी याद सिर्फ फिल्मों के किरदारों तक सीमित नहीं है। पटना की वह मुलाकात, मोकामा की यात्रा और ‘अपहरण’ में बिहार की पृष्ठभूमि—इन सबने नाना पाटेकर और बिहार के बीच एक ऐसा रिश्ता बनाया, जिसे उनके प्रशंसक लंबे समय तक याद रखेंगे।





