1st Bihar Published by: First Bihar Updated Tue, 27 Jan 2026 09:49:25 AM IST
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land for job : राजधानी की अदालत में आज ‘लैंड फॉर जॉब’ (Land for Job) भ्रष्टाचार मामले में एक महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह सुनवाई उस याचिका पर होगी जिसे राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने दायर किया है। भोला यादव इस मामले में सह-आरोपी हैं और उन्होंने अदालत में आरोप लगाया है कि सीबीआई (CBI) ने जिन पांच लोगों को सरकारी गवाह बनाया है, उनके बयान कानून के मुताबिक दर्ज नहीं किए गए, इसलिए वे अवैध और अमान्य हैं।
याचिका में क्या है आरोप?
भोला यादव की याचिका में यह मुख्य आरोप लगाया गया है कि सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने के क्रम में नियमों का पालन नहीं किया। याचिका में कहा गया है कि इन पांच गवाहों के बयान पहले दर्ज कर लिए गए और बाद में उन्हें माफी (compounding) दी गई। जबकि कानून के अनुसार पहले माफी दी जाती है और उसके बाद ही बयान दर्ज किए जाते हैं। इस प्रक्रिया के उलट होने से गवाहों के बयान अवैध माने जा सकते हैं और उन्हें सबूत के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी कहा गया है कि गवाहों के बयान स्वैच्छिक नहीं हैं और उन्हें प्रभावित किया गया है। इसलिए, इन बयानों पर आधारित कोई भी दोष सिद्धि न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
क्या है ‘लैंड फॉर जॉब’ मामला?
‘लैंड फॉर जॉब’ नाम से चर्चित यह मामला एक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितता से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी जमीन को रोजगार और विकास के नाम पर लाभार्थियों को आवंटित करने के दौरान भ्रष्ट तरीके से जमीन आवंटित की गई, और इसके बदले में अवैध लाभ लिया गया। मामले में कई बड़े नामों का जिक्र आया है और जांच एजेंसियों ने कई लोगों को आरोपी बनाया है। इस मामले में कई सालों से जांच और सुनवाई जारी है और अदालत में अब तक कई अहम मोड़ आए हैं। मामले की गंभीरता और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यह लंबे समय से सुर्खियों में है।
राजधानी की अदालत में आज ‘लैंड फॉर जॉब’ (Land for Job) भ्रष्टाचार मामले में एक महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह सुनवाई उस याचिका पर होगी जिसे राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने दायर किया है। भोला यादव इस मामले में सह-आरोपी हैं और उन्होंने अदालत में आरोप लगाया है कि सीबीआई (CBI) ने जिन पांच लोगों को सरकारी गवाह बनाया है, उनके बयान कानून के मुताबिक दर्ज नहीं किए गए, इसलिए वे अवैध और अमान्य हैं।
याचिका में क्या है आरोप?
भोला यादव की याचिका में यह मुख्य आरोप लगाया गया है कि सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने के क्रम में नियमों का पालन नहीं किया। याचिका में कहा गया है कि इन पांच गवाहों के बयान पहले दर्ज कर लिए गए और बाद में उन्हें माफी (compounding) दी गई। जबकि कानून के अनुसार पहले माफी दी जाती है और उसके बाद ही बयान दर्ज किए जाते हैं। इस प्रक्रिया के उलट होने से गवाहों के बयान अवैध माने जा सकते हैं और उन्हें सबूत के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी कहा गया है कि गवाहों के बयान स्वैच्छिक नहीं हैं और उन्हें प्रभावित किया गया है। इसलिए, इन बयानों पर आधारित कोई भी दोष सिद्धि न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
क्या है ‘लैंड फॉर जॉब’ मामला?
‘लैंड फॉर जॉब’ नाम से चर्चित यह मामला एक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितता से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी जमीन को रोजगार और विकास के नाम पर लाभार्थियों को आवंटित करने के दौरान भ्रष्ट तरीके से जमीन आवंटित की गई, और इसके बदले में अवैध लाभ लिया गया। मामले में कई बड़े नामों का जिक्र आया है और जांच एजेंसियों ने कई लोगों को आरोपी बनाया है। इस मामले में कई सालों से जांच और सुनवाई जारी है और अदालत में अब तक कई अहम मोड़ आए हैं। मामले की गंभीरता और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यह लंबे समय से सुर्खियों में है।
याचिका का संभावित असर
भोला यादव की याचिका में उठाए गए मुद्दे का असर पूरे मामले की दिशा पर पड़ सकता है। यदि अदालत यह मानती है कि गवाहों के बयान अवैध हैं, तो सीबीआई की जांच और आरोप तय करने की प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे साक्ष्य की वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं साथ हीअभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलें कमजोर हो सकती हैं। जिससे मामले की सुनवाई में देरी हो सकती है या कुछ आरोपियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। दूसरी ओर, यदि अदालत इस याचिका को खारिज कर देती है, तो मामला अपने सामान्य कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ेगा और गवाहों के बयान मूल साक्ष्य के रूप में अदालत में प्रयुक्त होंगे।
अदालत में बहस की क्या उम्मीद है?
आज की सुनवाई में मुख्य रूप से यह बहस होगी कि क्या सीआरपीसी की धारा 164 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करने का क्रम कानून के अनुरूप था या नहीं। याचिका पक्ष यह तर्क रखेगा कि गवाहों के बयान अवैध हैं और इसलिए उन्हें सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, सीबीआई की ओर से यह दलील दी जा सकती है कि बयान दर्ज करने में कोई कानूनी अनियमितता नहीं हुई है और गवाहों के बयान स्वैच्छिक और वैध हैं। अदालत के इस निर्णय से न केवल भोला यादव की मुश्किलें तय होंगी, बल्कि पूरे ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।
क्या यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है?
इस मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता इसलिए भी है क्योंकि इसमें राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के शीर्ष नेताओं का नाम जुड़ा है। ऐसे मामलों में अदालत का फैसला केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। आज की सुनवाई में अदालत की ओर से जो भी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, वह आने वाले दिनों में इस मामले की गति और परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
राजधानी की अदालत में आज ‘लैंड फॉर जॉब’ (Land for Job) भ्रष्टाचार मामले में एक महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह सुनवाई उस याचिका पर होगी जिसे राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने दायर किया है। भोला यादव इस मामले में सह-आरोपी हैं और उन्होंने अदालत में आरोप लगाया है कि सीबीआई (CBI) ने जिन पांच लोगों को सरकारी गवाह बनाया है, उनके बयान कानून के मुताबिक दर्ज नहीं किए गए, इसलिए वे अवैध और अमान्य हैं।
याचिका में क्या है आरोप?
भोला यादव की याचिका में यह मुख्य आरोप लगाया गया है कि सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने के क्रम में नियमों का पालन नहीं किया। याचिका में कहा गया है कि इन पांच गवाहों के बयान पहले दर्ज कर लिए गए और बाद में उन्हें माफी (compounding) दी गई। जबकि कानून के अनुसार पहले माफी दी जाती है और उसके बाद ही बयान दर्ज किए जाते हैं। इस प्रक्रिया के उलट होने से गवाहों के बयान अवैध माने जा सकते हैं और उन्हें सबूत के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी कहा गया है कि गवाहों के बयान स्वैच्छिक नहीं हैं और उन्हें प्रभावित किया गया है। इसलिए, इन बयानों पर आधारित कोई भी दोष सिद्धि न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
क्या है ‘लैंड फॉर जॉब’ मामला?
‘लैंड फॉर जॉब’ नाम से चर्चित यह मामला एक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितता से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी जमीन को रोजगार और विकास के नाम पर लाभार्थियों को आवंटित करने के दौरान भ्रष्ट तरीके से जमीन आवंटित की गई, और इसके बदले में अवैध लाभ लिया गया। मामले में कई बड़े नामों का जिक्र आया है और जांच एजेंसियों ने कई लोगों को आरोपी बनाया है। इस मामले में कई सालों से जांच और सुनवाई जारी है और अदालत में अब तक कई अहम मोड़ आए हैं। मामले की गंभीरता और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यह लंबे समय से सुर्खियों में है।
याचिका का संभावित असर
भोला यादव की याचिका में उठाए गए मुद्दे का असर पूरे मामले की दिशा पर पड़ सकता है। यदि अदालत यह मानती है कि गवाहों के बयान अवैध हैं, तो सीबीआई की जांच और आरोप तय करने की प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे साक्ष्य की वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं साथ हीअभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलें कमजोर हो सकती हैं। जिससे मामले की सुनवाई में देरी हो सकती है या कुछ आरोपियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। दूसरी ओर, यदि अदालत इस याचिका को खारिज कर देती है, तो मामला अपने सामान्य कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ेगा और गवाहों के बयान मूल साक्ष्य के रूप में अदालत में प्रयुक्त होंगे।
अदालत में बहस की क्या उम्मीद है?
आज की सुनवाई में मुख्य रूप से यह बहस होगी कि क्या सीआरपीसी की धारा 164 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करने का क्रम कानून के अनुरूप था या नहीं। याचिका पक्ष यह तर्क रखेगा कि गवाहों के बयान अवैध हैं और इसलिए उन्हें सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, सीबीआई की ओर से यह दलील दी जा सकती है कि बयान दर्ज करने में कोई कानूनी अनियमितता नहीं हुई है और गवाहों के बयान स्वैच्छिक और वैध हैं। अदालत के इस निर्णय से न केवल भोला यादव की मुश्किलें तय होंगी, बल्कि पूरे ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।
क्या यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है?
इस मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता इसलिए भी है क्योंकि इसमें राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के शीर्ष नेताओं का नाम जुड़ा है। ऐसे मामलों में अदालत का फैसला केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। आज की सुनवाई में अदालत की ओर से जो भी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, वह आने वाले दिनों में इस मामले की गति और परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
भोला यादव की याचिका में उठाए गए मुद्दे का असर पूरे मामले की दिशा पर पड़ सकता है। यदि अदालत यह मानती है कि गवाहों के बयान अवैध हैं, तो सीबीआई की जांच और आरोप तय करने की प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे साक्ष्य की वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं साथ हीअभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलें कमजोर हो सकती हैं। जिससे मामले की सुनवाई में देरी हो सकती है या कुछ आरोपियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। दूसरी ओर, यदि अदालत इस याचिका को खारिज कर देती है, तो मामला अपने सामान्य कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ेगा और गवाहों के बयान मूल साक्ष्य के रूप में अदालत में प्रयुक्त होंगे।
अदालत में बहस की क्या उम्मीद है?
आज की सुनवाई में मुख्य रूप से यह बहस होगी कि क्या सीआरपीसी की धारा 164 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करने का क्रम कानून के अनुरूप था या नहीं। याचिका पक्ष यह तर्क रखेगा कि गवाहों के बयान अवैध हैं और इसलिए उन्हें सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, सीबीआई की ओर से यह दलील दी जा सकती है कि बयान दर्ज करने में कोई कानूनी अनियमितता नहीं हुई है और गवाहों के बयान स्वैच्छिक और वैध हैं। अदालत के इस निर्णय से न केवल भोला यादव की मुश्किलें तय होंगी, बल्कि पूरे ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।
क्या यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है?
इस मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता इसलिए भी है क्योंकि इसमें राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी और पार्टी के शीर्ष नेताओं का नाम जुड़ा है। ऐसे मामलों में अदालत का फैसला केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। आज की सुनवाई में अदालत की ओर से जो भी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, वह आने वाले दिनों में इस मामले की गति और परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।