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Lalu Yadav : लालू की पहली जीप... कर्पूरी ठाकुर की आखिरी उम्मीद! एक गाड़ी की कहानी, जिसने बिहार की राजनीति के दो चेहरे दिखा दिए

लालू यादव की पहली महिंद्रा जीप आज फिर चर्चा में है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी जीप से जुड़ा एक ऐसा किस्सा भी है, जब बीमार कर्पूरी ठाकुर को विधानसभा जाना था और उन्हें मदद नहीं मिल सकी। पढ़िए 'बंधु बिहारी' में दर्ज पूरी राजनीतिक कहानी।

Lalu Yadav
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© Lalu Yadav
Tejpratap
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Lalu Yadav : बिहार की राजनीति में कुछ किस्से ऐसे हैं जो समय के साथ इतिहास बन जाते हैं। कुछ घटनाएं सिर्फ नेताओं की नहीं होतीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व की पहचान बन जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी जुड़ी है जननायक कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव और एक महिंद्रा जीप से। यह कहानी सिर्फ एक गाड़ी की नहीं, बल्कि रिश्तों, राजनीति, महत्वाकांक्षा और बदलते दौर की भी है।


आज जब पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी 20 साल बाद 10 सर्कुलर रोड का सरकारी आवास छोड़कर कौटिल्य नगर स्थित अपने निजी आवास में शिफ्ट हो चुकी हैं, तो उसी के साथ लालू प्रसाद यादव की चर्चित महिंद्रा जीप भी एक बार फिर सुर्खियों में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ऐतिहासिक जीप अब तेजस्वी यादव के सरकारी आवास पहुंच गई है। लेकिन इस जीप की चर्चा के साथ एक पुराना किस्सा भी फिर से लोगों की जुबान पर लौट आया है।


यह किस्सा उन दिनों का है, जब जननायक कर्पूरी ठाकुर बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। स्वास्थ्य खराब था। डॉक्टरों ने आराम की सलाह दी थी। लेकिन विधानसभा में एक महत्वपूर्ण बहस होनी थी और कर्पूरी ठाकुर मानते थे कि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। बीमारी शरीर पर हावी थी, लेकिन जिम्मेदारी उनके मन पर। समस्या यह थी कि उनके पास विधानसभा जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं थी।


कर्पूरी ठाकुर का जीवन सादगी की मिसाल था। सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने कभी वैभव का रास्ता नहीं चुना। निजी सुविधाओं से हमेशा दूरी बनाए रखी। ऐसे में उन्होंने अपने सहयोगी और लोकदल नेता शिवनंदन पासवान से कहा कि किसी तरह विधानसभा पहुंचने की व्यवस्था की जाए। शिवनंदन पासवान को सबसे पहले लालू प्रसाद यादव का नाम याद आया। उस समय लालू यादव तेजी से उभरते हुए नेता थे। उनके पास अपनी महिंद्रा जीप थी, जिसे वे अक्सर खुद चलाते थे। राजनीतिक गलियारों में यह भी किसी से छिपा नहीं था कि लालू यादव को राजनीति की मुख्यधारा में लाने वालों में सबसे बड़ा नाम कर्पूरी ठाकुर का ही था। आपातकाल के बाद जेल से निकलने पर 1977 में लोकसभा का टिकट दिलाने से लेकर बाद में विधानसभा का टिकट दिलाने तक, कर्पूरी ठाकुर ने लालू यादव पर पूरा भरोसा जताया था। यही वजह थी कि शिवनंदन पासवान को पूरा विश्वास था कि जैसे ही लालू यादव को पता चलेगा कि कर्पूरी ठाकुर को विधानसभा जाना है, वे तुरंत जीप लेकर उनके दरवाजे पहुंच जाएंगे। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा।


संकर्षण ठाकुर अपनी चर्चित पुस्तक "बंधु बिहारी : कहानी लालू यादव व नीतीश कुमार की" में इस घटना का विस्तार से उल्लेख करते हैं। किताब के मुताबिक, जब शिवनंदन पासवान ने लालू यादव से कहा कि कर्पूरी ठाकुर को विधानसभा जाना है और आपकी जीप की जरूरत है, तब लालू यादव का जवाब सुनकर वे हैरान रह गए।


लालू यादव ने कहा—"आप कर्पूरी जी से खुद के लिए एक कार खरीदने को क्यों नहीं कहते? वह तो बड़े नेता हैं।" यह जवाब सुनकर शिवनंदन पासवान निराश लौट आए। उन्होंने पूरा घटनाक्रम कर्पूरी ठाकुर को बताया। जननायक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन यह घटना उनके बेहद करीबी लोगों के बीच लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही।


इसी पुस्तक में लेखक संकर्षण ठाकुर आगे लिखते हैं कि लालू यादव कभी भी कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक छाया में रहना पसंद नहीं करते थे। उनके भीतर हमेशा अपनी अलग पहचान बनाने की इच्छा थी। लेखक के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव ने धीरे-धीरे कर्पूरी ठाकुर के योगदान का सार्वजनिक उल्लेख करना भी लगभग बंद कर दिया। उनका प्रयास था कि बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा समाजवादी नेता और सबसे बड़ा जननेता के रूप में उनका अपना नाम स्थापित हो। यह पुस्तक बिहार की राजनीति के उस दौर की कई अनकही परतों को सामने लाती है और कर्पूरी ठाकुर तथा लालू यादव के रिश्तों के उतार-चढ़ाव को भी विस्तार से दर्ज करती है।


उधर, जिस महिंद्रा जीप को लेकर यह पूरा किस्सा जुड़ा हुआ है, उसकी अपनी अलग राजनीतिक यात्रा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 1977 में सांसद बनने के बाद लालू यादव खुद कोलकाता गए थे। उस समय सेना द्वारा इस्तेमाल के बाद बेची जा रही मिलिट्री डिस्पोजल गाड़ियों की नीलामी होती थी। सांसदों और विधायकों को इन्हें खरीदने की सुविधा मिलती थी। वहीं से लालू यादव ने करीब पांच हजार रुपये में यह महिंद्रा जीप खरीदी।


इसके बाद करीब डेढ़ दशक तक यही जीप लालू यादव की सबसे भरोसेमंद साथी बनी रही। गांव-गांव के दौरे, चुनाव प्रचार, जनसभाएं और राजनीतिक यात्राएं—हर सफर इसी जीप ने तय किया। मार्च 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद ही लालू यादव ने पहली बार सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल शुरू किया। यह सिर्फ एक वाहन नहीं था। यह उस दौर की समाजवादी राजनीति का चलता-फिरता प्रतीक भी बन गया।


बताया जाता है कि समाजवादी नेता शरद यादव समेत कई बड़े नेताओं ने भी इसी जीप में सफर किया। कई बार रास्ते में जीप खराब हो जाती थी तो नेता और कार्यकर्ता मिलकर धक्का लगाते थे। पुराने समाजवादियों के बीच यह किस्सा आज भी मुस्कुराहट के साथ सुनाया जाता है। समय बदला, सत्ता बदली, चेहरे बदले, लेकिन यह जीप लालू यादव के साथ बनी रही। 24 नवंबर 2021 को लालू यादव ने खुद इस जीप को चलाते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वीडियो साझा किया था। समर्थकों ने उस वीडियो को पुराने दिनों की याद बताते हुए खूब पसंद किया। 


आज जब यह जीप फिर चर्चा में है, तब उसके साथ जुड़ी दो तस्वीरें भी लोगों के सामने हैं। पहली तस्वीर उस युवा नेता की है, जिसने इसी जीप पर सवार होकर गांव-गांव राजनीति की जमीन तैयार की। दूसरी तस्वीर उस बीमार जननायक की है, जिसे विधानसभा पहुंचने के लिए उसी जीप की जरूरत थी, लेकिन वह मदद उन्हें नहीं मिल सकी।


इतिहास अक्सर इमारतों या गाड़ियों से नहीं बनता, बल्कि उन पलों से बनता है, जब रिश्ते और व्यवहार किसी व्यक्ति के चरित्र की सबसे बड़ी पहचान बन जाते हैं। लालू यादव की महिंद्रा जीप आज भी बिहार की राजनीति की एक विरासत है, लेकिन उसके साथ जुड़ा कर्पूरी ठाकुर वाला यह प्रसंग भी उतना ही बड़ा राजनीतिक दस्तावेज माना जाता है। शायद यही वजह है कि जब भी इस जीप का जिक्र होता है, उसके पहियों के साथ बिहार की राजनीति का वह अनकहा अध्याय भी फिर से चल पड़ता है।