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करप्शन केस में फंसे 'अधीक्षण अभियंता' की बंद फाइल फिर खुलेगी, पत्नी-परिवार के नाम पर करोड़ों की संपत्ति और 1976 के पत्र को आधार बनाकर बच निकलिए...अब यह नहीं चलेगा, पढ़ें....

डीए केस में फंसे ग्रामीण कार्य विभाग के पूर्व अधीक्षण अभियंता को 2023 में मिली क्लिनचिट पर अब सवाल उठ गए हैं.निगरानी ब्यूरो की आपत्ति के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने मामले में पुनर्विचार का निर्देश दिया है. अब RWD सचिव इस मामले की सुनवाई करेंगे.

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 25, 2026, 2:24:52 PM

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AI से सांकेतिक तस्वीर - फ़ोटो Google

Bihar News: बिहार में भ्रष्टाचार के आरोपी अफसर पहुंच-पैरवी या तरह-तरह के प्रमाण पेश कर बचने की कोशिश करते हैं. आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपी एक अधीक्षण अभियंता इसी फार्मूले से बच निकले थे. निगरानी ब्यूरो ने जब चैलेंज किया, तब सरकार की नजर गई. इसके बाद अधीक्षण अभियंता जिन्हें 3 साल पूर्व आरोप मुक्त कर दिया गया था, उनकी फाइल फिर से खुलने वाली है. 

निगरानी ने अधीक्षण अभियंता के खिलाफ 2013 में दर्ज किया था डीए केस 

ग्रामीण कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया गया था. निगरानी ब्यूरो ने 22 अगस्त 2013 को कांड संख्या-50 दर्ज किया था. इन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप थे. इसी बीच अरविंद कुमार सिंह 31 मई 2015 को सेवानिवृत हो गए.  डीए केस दर्ज होने के बाद ग्रामीण कार्य विभाग ने इनके खिलाफ 24 मार्च 2014 के प्रभाव से विभागीय कार्यवाही शुरू किया. जांच के बाद आरोप सही नहीं पाते हुए 9 नवंबर 2023 को इन्हें आरोप मुक्त कर दिया गया. जांच अधिकारी ने जो रिपोर्ट दिया था, उसमें सभी आरोप अप्रमाणित बताये गए. 

निगरानी ने सामान्य प्रशासन विभाग से की थी शिकायत 

निगरानी ब्यूरो ने सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र लिखकर इस निर्णय को चैलेंज किया. तत्कालीन अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार सिंह के संदर्भ में पारित आदेश पर पुनर्विचार का निर्देश देने को कहा गया. निगरानी ब्यूरो का आधार यह था कि विभागीय कार्यवाही में पेट्रोल पंप या होटल बिल्डिंग, जो इनके द्वारा(अधीक्षण अभियंता) अर्जित की गई हैं, इससे संबंधित सूचना अपने विभाग को नहीं दी . साथ ही विभाग से अनुमति भी नहीं प्राप्त की गई थी. यह बिहार सरकारी सेवक नियमावली में वर्णित प्रावधान का उल्लंघन है.

1976 के पत्र को आधार बनाकर 2023 में दी गई थी क्लिनचिट 

ग्रामीण कार्य विभाग के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा अपने द्वितीय बचाव बयान में अभिव्यक्त किया था कि संबंधित परिसंपत्तियों उनके परिवार के सदस्यों द्वारा निजी आय एवं ऋण से अर्जित की गई है. ऐसे में इन संपत्तियों का विवरण देना अनिवार्य एवं बाध्यकारी नहीं है. इस तर्क के समर्थन में इन्होंने कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग का पुराना आदेश (1976) पत्र प्रस्तुत किया. जिसे स्वीकार कर लिया गया था. यहीं पर निगरानी ब्यूरो ने पकड़ लिया और सामान्य प्रशासन विभाग के समक्ष आपत्ति दर्ज की.  

निगरानी के तर्क को सामान्य प्रशासन विभाग ने सही माना

निगरानी ब्यूरो का कहना है कि सामान्य प्रशासन विभाग ने 6 जनवरी 2012 को एक पत्र जारी किया. जिसमें स्पष्ट प्रावधान है लोक सेवकों को अपने पति-पत्नी और आश्रितों द्वारा अर्जित सभी संपत्ति एवं दायित्व का विवरण प्रत्येक वर्ष प्रस्तुत करना है. पति-पत्नी एवं आश्रितों द्वारा स्व अर्जित संपत्ति एवं दायित्वों का विवरण समर्पित करना है. इसमें किसी प्रकार की छूट का प्रावधान नहीं है. निगरानी के तर्क को सामान्य प्रशासन विभाग ने सही माना. 

सामान्य प्रशासन विभाग ने किया साफ- 2012 के पत्र से 1976 वाला पत्र स्वतः समाप्त 

सामान्य प्रशासन विभाग ने 11 फरवरी 2026 को यह उल्लेख किया कि जब किसी विषय के संबंध में वर्ष 2012 में विस्तृत दिशा निर्देश निर्गत कर दिया है, ऐसे में पूर्व यानी 1976 में निर्गत निर्देश स्वतः समाप्त हो जाएगा. इस आलोक में ग्रामीण कार्य विभाग के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार सिंह को आरोप मुक्त किए जाने से संबंधित निर्णय पर निगरानी विभाग का अनुरोध तर्कसंगत है. 

ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव करेंगे सुनवाई 

सामान्य प्रशासन विभाग ने ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी दी है कि आप सुनवाई कर मंतव्य दें. इसके बाद ग्रामीण कार्य विभाग ने 17 मार्च को पत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि इस मामले की सुनवाई सचिव स्तर से की जायेगी. जिसकी सूचना सभी संबंधितों को दी जायेगी.