1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mon, 26 Jan 2026 10:44:20 AM IST
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112 Bihar : बिहार में सड़क दुर्घटनाओं के बाद घायलों को समय पर इलाज मुहैया कराने की दिशा में राज्य सरकार एक अहम कदम उठाने जा रही है। अब बिहार की निजी एम्बुलेंस सेवाओं को भी एकीकृत आपातकालीन नंबर 112 से जोड़ा जाएगा। इस संबंध में पहले लिए गए निर्णय पर अमल शुरू हो चुका है और परिवहन विभाग ने स्वास्थ्य विभाग को शीघ्र कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों को बिना देरी के नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाना है, ताकि उनकी जान बचाई जा सके।
विभागीय अधिकारियों के अनुसार हाल ही में परिवहन सचिव राज कुमार की अध्यक्षता में सड़क दुर्घटनाओं की समीक्षा बैठक हुई थी। इस बैठक में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। समीक्षा में यह पाया गया कि मिजोरम के बाद बिहार देश का दूसरा ऐसा राज्य है, जहां सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक मौतें हो रही हैं। विशेषज्ञों और अधिकारियों ने इसके पीछे राज्य में एम्बुलेंस सेवाओं की कमी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की सुस्ती को प्रमुख कारण बताया।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो बिहार में निजी और सरकारी मिलाकर लगभग 3700 एम्बुलेंस हैं। हालांकि इनमें से करीब 2000 एम्बुलेंस ही सरकार के अधीन कार्यरत हैं, जबकि शेष निजी एम्बुलेंस अलग-अलग स्तर पर संचालित हो रही हैं। निजी एम्बुलेंस सेवाओं के आपातकालीन नंबर 112 से न जुड़े होने के कारण दुर्घटना के समय उनका प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता। जब कोई सड़क दुर्घटना होती है और लोग डायल 112 पर कॉल करते हैं, तो एम्बुलेंस के पहुंचने में काफी समय लग जाता है।
स्वास्थ्य मानकों के अनुसार किसी भी आपात स्थिति में कॉल मिलने के 10 मिनट के भीतर मरीज तक एम्बुलेंस पहुंच जानी चाहिए। लेकिन बिहार में औसतन यह समय 25 मिनट या उससे भी अधिक हो रहा है। कई मामलों में तो एम्बुलेंस देर से पहुंचने के कारण घायलों की हालत गंभीर हो जाती है या उनकी जान तक चली जाती है। यही वजह है कि सरकार अब निजी एम्बुलेंस को भी 112 नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी कर रही है, ताकि उपलब्ध सभी संसाधनों का एकीकृत रूप से उपयोग किया जा सके।
परिवहन विभाग का मानना है कि निजी एम्बुलेंस के जुड़ने से रिस्पॉन्स टाइम में काफी सुधार होगा। किसी भी दुर्घटना की सूचना मिलते ही नजदीकी उपलब्ध एम्बुलेंस को मौके पर भेजा जा सकेगा, चाहे वह सरकारी हो या निजी। इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि घायलों को “गोल्डन ऑवर” के भीतर अस्पताल पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा मरीज की जान बचाने के लिहाज से बेहद अहम होता है।
बिहार में ट्रॉमा के इलाज के लिए भी व्यवस्था की गई है। राज्य के कुल 55 अस्पतालों को ट्रॉमा सेंटर के रूप में चिह्नित किया गया है। इनमें लेबल-2 के 10 अस्पताल, लेबल-3 के 35 अस्पताल और एकीकृत ट्रॉमा सेंटर एवं आपातकालीन सेवा के रूप में 10 अस्पताल अधिसूचित हैं। लेबल-2 अस्पतालों में 200 से अधिक बेड होना अनिवार्य है, जिनमें से कम से कम 20 बेड ट्रॉमा सेंटर के लिए आरक्षित रहने चाहिए। वहीं लेबल-3 अस्पतालों में न्यूनतम 100 बेड होना जरूरी है, जिनमें ट्रॉमा के लिए 10 बेड निर्धारित किए गए हैं। इन 10 बेड में पांच आईसीयू और पांच ट्रॉमा इमरजेंसी के लिए होने चाहिए।
हालांकि सरकार द्वारा ट्रॉमा सेंटरों की संख्या बढ़ाई गई है, लेकिन समय पर मरीजों को इन अस्पतालों तक पहुंचाना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। एम्बुलेंस सेवाओं की कमी और समन्वय के अभाव में ट्रॉमा सेंटरों का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसी समस्या को दूर करने के लिए निजी एम्बुलेंस को 112 से जोड़ने की योजना को अहम माना जा रहा है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से जल्द ही इस व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा। इसके लिए तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर तैयारी की जा रही है। उम्मीद है कि इस कदम के बाद बिहार में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में कमी आएगी और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं अधिक प्रभावी बन सकेंगी। राज्य सरकार का यह प्रयास यदि सफल रहा, तो यह आम जनता के लिए एक बड़ी राहत साबित होगा।