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Bihar Election 2026 : बिहार की राजनीति में PK की धमाकेदार एंट्री, बीजेपी का गढ़ हिला, RJD का MY समीकरण भी ध्वस्त

बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने बिहार की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय से BJP के मजबूत किले में प्रशांत किशोर की जन सुराज ने बड़ी चुनौती पेश की। वहीं RJD का पारंपरिक MY समीकरण भी इस चुनाव में कमजोर नजर आया।

Bihar Election 2026
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© file photo
Tejpratap
Tejpratap
5 मिनट

Bihar Election 2026 : बिहार की सबसे हाईप्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव ने राज्य की सियासत में नया अध्याय जोड़ दिया है। जिस सीट को पिछले तीन दशक से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का अभेद्य किला माना जाता था, वहां इस बार जन सुराज के प्रशांत किशोर (PK) की एंट्री ने चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल दिए। चुनाव परिणामों ने यह संकेत दे दिया है कि बिहार की राजनीति में नए विकल्पों की तलाश तेज हो चुकी है।

बांकीपुर सीट पर इस बार मुकाबला सिर्फ तीन उम्मीदवारों के बीच नहीं था, बल्कि यह भाजपा के मजबूत संगठन, प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक रणनीति और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण की परीक्षा भी थी। भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा, जन सुराज के प्रशांत किशोर और राजद की रेखा गुप्ता के बीच हुए इस मुकाबले में हर राउंड के साथ चुनावी तस्वीर बदलती नजर आई।

30 साल पुराने भाजपा गढ़ में PK ने लगाई सेंध

बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत किला रही है। 1995 से लगातार भाजपा इस सीट पर जीत दर्ज करती रही है। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके बेटे नितिन नवीन ने यहां पार्टी का दबदबा कायम रखा।नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की थी। 2025 में भी उन्होंने भारी मतों के अंतर से जीत हासिल कर यह साबित किया था कि बांकीपुर में भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत है।लेकिन उपचुनाव में प्रशांत किशोर की सक्रियता ने पुराने चुनावी समीकरणों को चुनौती दे दी। जन सुराज के उम्मीदवार के रूप में PK ने पहली बार विधानसभा चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया।

प्रशांत किशोर की रणनीति ने बदला चुनावी माहौल

प्रशांत किशोर लंबे समय तक चुनावी रणनीतिकार के रूप में देश की कई बड़ी राजनीतिक पार्टियों के साथ काम कर चुके हैं। बिहार में जन सुराज अभियान के जरिए उन्होंने खुद को एक नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश किया।बांकीपुर उपचुनाव में उन्होंने स्थानीय मुद्दों, युवाओं की नाराजगी और व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उनके रोड शो और जनसभाओं में उमड़ी भीड़ ने भाजपा और राजद दोनों खेमों की चिंता बढ़ा दी थी।चुनाव परिणामों ने यह दिखाया कि PK सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने वोटों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।

RJD के MY समीकरण पर भी उठे सवाल

बांकीपुर उपचुनाव में राजद ने रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा था। पार्टी को उम्मीद थी कि पारंपरिक MY समीकरण के सहारे वह भाजपा को चुनौती दे पाएगी। लेकिन चुनाव परिणामों ने राजद की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए। जिस मुस्लिम-यादव वोट बैंक को राजद अपना मजबूत आधार मानती रही है, उसमें इस बार बिखराव देखने को मिला। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहरी सीटों पर जातीय समीकरण के साथ-साथ विकास, रोजगार और नए नेतृत्व की मांग भी तेजी से प्रभाव डाल रही है।

बांकीपुर का चुनावी इतिहास रहा है बेहद दिलचस्प

बांकीपुर विधानसभा सीट का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 1957 में इस सीट से कांग्रेस के रामशरण साव विधायक बने थे। इसके बाद 1962 में कृष्ण बल्लभ सहाय ने जीत दर्ज की। 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा विधायक बने, जबकि 1969 के उपचुनाव में सीपीआई के ए.के. सेन ने जीत हासिल की। 1972 में सीपीआई के सुनील मुखर्जी विधायक बने। 1977 में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद और 1980 में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने जीत दर्ज की। 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव की जीत ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था। इसके बाद 1995 से भाजपा का दौर शुरू हुआ और नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने लगातार चार चुनाव जीते। 2006 में उनके निधन के बाद नितिन नवीन ने यह विरासत संभाली और लगातार जीत दर्ज करते रहे।

क्या बिहार में नए राजनीतिक विकल्प की शुरुआत?

बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे सिर्फ एक विधानसभा सीट का फैसला नहीं हैं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक सोच का संकेत भी हैं। प्रशांत किशोर की बढ़ती लोकप्रियता ने यह साबित किया है कि नए राजनीतिक चेहरे के लिए भी बिहार में जगह बन सकती है। भाजपा के सामने अब अपने पारंपरिक गढ़ों को बचाने की चुनौती होगी, जबकि राजद को भी अपने पुराने वोट बैंक को लेकर नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ेगी।

अब देखने वाली बात होगी कि बांकीपुर का यह चुनावी प्रयोग आने वाले बिहार विधानसभा चुनावों में कितना असर डालता है। क्या PK बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत बनकर उभरेंगे या यह सिर्फ एक सीट तक सीमित रहेगा, इसका जवाब आने वाला समय देगा।