ब्रेकिंग
सम्राट सरकार ने पुलिस महकमे में किया बड़ा बदलाव: विजलेंस कैडर खत्म हुआप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील: एक साल तक शादियों में सोना न खरीदें, पेट्रोल-डीजल को लेकर दी यह सलाहबिहार के 19 जिलों में आंधी-बारिश का येलो अलर्ट, जानिए.. अपने शहर के मौसम का हालPMGSY में बिहार ने बनाया बड़ा कीर्तिमान, ग्रामीण सड़क संपर्कता में हासिल किया देश में पहला स्थानBihar News: इंडियन एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन का बिहार उपाध्यक्ष ...धीरज पांडेय को मिली बड़ी जिम्मेदारीसम्राट सरकार ने पुलिस महकमे में किया बड़ा बदलाव: विजलेंस कैडर खत्म हुआप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील: एक साल तक शादियों में सोना न खरीदें, पेट्रोल-डीजल को लेकर दी यह सलाहबिहार के 19 जिलों में आंधी-बारिश का येलो अलर्ट, जानिए.. अपने शहर के मौसम का हालPMGSY में बिहार ने बनाया बड़ा कीर्तिमान, ग्रामीण सड़क संपर्कता में हासिल किया देश में पहला स्थानBihar News: इंडियन एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन का बिहार उपाध्यक्ष ...धीरज पांडेय को मिली बड़ी जिम्मेदारी

BIHAR NEWS : पंचायत बन गई अदालत! Love Marriage के बाद गांव का तुगलकी फरमान, जिंदा लड़की का कराया गया दाह संस्कार; पढ़िए क्या है पूरी खबर

मुजफ्फरपुर में प्रेम विवाह करने वाली युवती को पंचायत के फरमान पर जीते जी मृत घोषित कर दिया गया। परिवार ने सामाजिक बहिष्कार खत्म करने के लिए बेटी का पुतला बनाकर हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया।

BIHAR NEWS : पंचायत बन गई अदालत! Love Marriage के बाद गांव का तुगलकी फरमान, जिंदा लड़की का कराया गया दाह संस्कार; पढ़िए क्या है पूरी खबर
Tejpratap
Tejpratap
4 मिनट

BIHAR NEWS : मुजफ्फरपुर के जियन खुर्द गांव से सामने आई यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है जो आज भी इंसान की आजादी से ज्यादा “समाज की इज्जत” को बड़ा मानती है। जिस देश का संविधान एक बालिग महिला को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, उसी देश में एक पंचायत ने प्रेम विवाह करने वाली युवती को जीते जी “मरा हुआ” घोषित कर दिया। सवाल यह है कि आखिर यह कैसा समाज है, जहां प्यार करने की सजा मौत से भी बदतर दी जाती है?


करीब एक महीने पहले गांव की एक युवती अपने प्रेमी के साथ घर छोड़कर चली गई थी। परिजनों ने अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई, लेकिन पुलिस जांच में युवती बालिग निकली। कोर्ट में उसने साफ कहा कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है। कानून ने उसका साथ दिया, लेकिन समाज ने उसे अपराधी बना दिया।


यहीं से शुरू हुआ तथाकथित “इज्जत बचाने” का खेल। पंचायत ने परिवार को समाज से बाहर कर दिया। गांव में बहिष्कार शुरू हो गया। रिश्ते टूटने लगे, बातचीत बंद हो गई और दबाव इतना बढ़ा कि परिवार को अपनी ही जिंदा बेटी का अंतिम संस्कार करने पर मजबूर होना पड़ा। पंचायत ने फरमान सुनाया कि जब तक लड़की को “मरा हुआ” घोषित नहीं किया जाएगा, तब तक परिवार को समाज में दोबारा जगह नहीं मिलेगी।


रविवार को गांव में जो हुआ, वह किसी मध्यकालीन कहानी से कम नहीं था। एक जीवित लड़की का पुतला बनाया गया, उसे अर्थी पर लिटाया गया, गांव में शव यात्रा निकाली गई और फिर पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ उसका दाह संस्कार कर दिया गया। लोग तमाशबीन बने रहे, मंत्र पढ़े गए, लकड़ियां जलाई गईं और एक बेटी को कागजों और रस्मों में मार दिया गया।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पंचायत को यह अधिकार किसने दिया? क्या किसी गांव की पंचायत संविधान और अदालत से ऊपर हो गई है? अगर एक लड़की अपनी मर्जी से शादी करती है तो क्या वह अपने परिवार और समाज के लिए मर जाती है? क्या आज भी महिलाओं को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार सिर्फ किताबों तक सीमित है?


विडंबना देखिए, जब कोई नेता मंच से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देता है तो पूरा समाज तालियां बजाता है। लेकिन वही समाज एक बेटी के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने पर उसे जिंदा जला देने जैसी अमानवीय रस्म को चुपचाप देखता रहता है। यहां किसी ने यह नहीं पूछा कि गलती आखिर थी किसकी? प्यार करना अपराध कब से हो गया?


यह घटना सिर्फ पंचायत की मानसिकता नहीं दिखाती, बल्कि प्रशासन और समाज दोनों की विफलता भी उजागर करती है। अगर सामाजिक दबाव इतना खतरनाक हो जाए कि परिवार अपनी ही बेटी का प्रतीकात्मक दाह संस्कार कर दे, तो यह सिर्फ एक गांव का मामला नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र और मानवाधिकार पर सीधा सवाल बन जाता है।


स्थानीय मुखिया ने इसे “सामाजिक दबाव” बताया है, जबकि पुलिस जांच की बात कर रही है। लेकिन असली जरूरत सिर्फ जांच की नहीं, सोच बदलने की है। क्योंकि जब तक गांवों में पंचायतें कानून से ऊपर खुद को समझती रहेंगी, तब तक प्रेम, स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकार ऐसे ही चिताओं में जलते रहेंगे।


आज जरूरत इस बात की है कि समाज यह तय करे कि वह 21वीं सदी में जीना चाहता है या फिर उसी दौर में लौटना चाहता है जहां इंसान की जिंदगी का फैसला भीड़ और पंचायतें किया करती थीं। क्योंकि अगर प्यार करने वाली बेटियां यूं ही “जिंदा लाश” घोषित होती रहीं, तो फिर संविधान में लिखी आजादी सिर्फ किताबों का शब्द बनकर रह जाएगी।

संबंधित खबरें