Bihar Panchayat Election 2026 : बिहार में पंचायत चुनाव 2026 को लेकर गांव की राजनीति गर्म होने लगी है, लेकिन चुनाव की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। एक तरफ मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होने का समय करीब आ रहा है, तो दूसरी तरफ पंचायतों के परिसीमन की प्रक्रिया ने नई उलझन खड़ी कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि पहले चुनाव होगा या पहले पंचायतों की नई सीमाएं तय होंगी?
राज्य निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर पंचायत आम निर्वाचन 2026 से जुड़े कई आदेश और परिसीमन संबंधी अधिसूचनाएं जारी हैं। आयोग के मुताबिक जनसंख्या में बदलाव और नगर निकाय क्षेत्रों के विस्तार के कारण ग्राम पंचायत, वार्ड, पंचायत समिति और जिला परिषद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया की जा रही है।यानी इस बार पंचायत चुनाव सिर्फ वोट और उम्मीदवारों का मुकाबला नहीं होगा, बल्कि कई गांवों में चुनावी मैदान का नक्शा ही बदल सकता है।
21 सितंबर को पटना में आयोजित ‘ग्राम संसद-बिहार चैप्टर’ मुखिया संवाद कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पंचायतों और ग्रामीण विकास को लेकर प्रतिनिधियों से सुझाव मांगे थे। कार्यक्रम में त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका और गांवों के विकास पर चर्चा हुई। इसी बीच पंचायत प्रतिनिधियों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा परिसीमन और आरक्षण को लेकर है। अगर किसी पंचायत की सीमा बदलती है, कोई गांव दूसरी पंचायत में चला जाता है या नई पंचायत का गठन होता है तो मौजूदा मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य की पूरी चुनावी रणनीति बदल सकती है।
सबसे बड़ा पेच आरक्षण को लेकर भी है। परिसीमन के बाद सीटों की श्रेणी में बदलाव हुआ तो जिस सीट से कोई मौजूदा प्रतिनिधि दोबारा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है, वही सीट सामान्य से आरक्षित या आरक्षित से सामान्य हो सकती है। महिला आरक्षण का असर भी सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।यही वजह है कि कई पंचायत प्रतिनिधि अभी खुलकर चुनावी तैयारी करने से बच रहे हैं। उन्हें डर है कि आज जिस पंचायत में पकड़ मजबूत करने की कोशिश हो रही है, परिसीमन के बाद उसका भूगोल ही बदल जाए।
पुनपुन प्रखंड की लखना पूर्वी पंचायत के मुखिया पति सिद्धेश्वर पासवान का कहना है कि परिसीमन को लेकर असमंजस जरूर है। उनका कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पंचायत की सीमा कितनी बदलेगी और आरक्षण किस श्रेणी में जाएगा। हालांकि उनकी मांग है कि चुनाव समय-सीमा के भीतर कराया जाए, ताकि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहे। दूसरी तरफ सोनबाई पंचायत के पूर्व मुखिया वीरेंद्र कुमार परिसीमन को जरूरी मानते हैं। उनका तर्क है कि आबादी बढ़ने के साथ पंचायतों का आकार और प्रशासनिक बोझ भी बढ़ा है। अगर नई पंचायतें बनती हैं और क्षेत्रफल छोटा होता है तो लोगों के लिए अपने प्रतिनिधि तक पहुंचना आसान हो सकता है। लेकिन वह भी चाहते हैं कि चुनाव में बहुत ज्यादा देरी न हो।
इस पूरे विवाद में एक और अहम सवाल 2011 की जनगणना का है। राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत आम निर्वाचन 2026 के लिए आरक्षण निर्धारण से जुड़े प्रपत्र-1 में 2011 की जनसंख्या को आधार बनाया है। आयोग ने इस संबंध में प्रपत्र-1 का अंतिम प्रकाशन भी किया है। हालांकि सरकार की ओर से परिसीमन को पंचायतों को ज्यादा व्यवस्थित करने की प्रक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।
यहीं से पंचायत चुनाव का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—अगर मौजूदा प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म हो गया और चुनाव तत्काल नहीं हुआ तो पंचायतों की कमान किस व्यवस्था के तहत चलेगी? प्रतिनिधियों को चिंता है कि लंबा अंतराल होने पर सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक भवन और दूसरी स्थानीय योजनाओं से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं।दूसरी तरफ मुखिया संघ और कई पंचायत प्रतिनिधियों का सुझाव है कि पहले चुनाव करा लिया जाए और उसके बाद परिसीमन किया जाए। उनका कहना है कि इससे वर्तमान पंचायत व्यवस्था में लंबा अंतराल नहीं आएगा।
बिहार में पंचायत चुनाव त्रिस्तरीय व्यवस्था के तहत होते हैं। इसमें ग्राम पंचायत सदस्य, मुखिया, ग्राम कचहरी पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य चुने जाते हैं। राज्य निर्वाचन आयोग 2026 के पंचायत चुनाव की तैयारियों को लेकर पहले से कई प्रशासनिक आदेश जारी कर चुका है। फरवरी 2026 में जिला निर्वाचन पदाधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ा आदेश भी जारी किया गया था। ऐसे में अब गांव की राजनीति में असली इंतजार दो चीजों का है—परिसीमन की अंतिम तस्वीर और चुनाव कार्यक्रम। सीमा बदलेगी तो समीकरण बदलेंगे, आरक्षण बदलेगा तो उम्मीदवार बदल सकते हैं और चुनाव टला तो पंचायत की पूरी राजनीतिक रणनीति बदल सकती है। फिलहाल गांव-गांव में एक ही सवाल घूम रहा है—‘नई पंचायत बनेगी या पुरानी पंचायत में ही होगा मुकाबला, और आखिर वोट कब पड़ेगा?’





