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illegal jamabandi : बिहार में इन लोगों से सरकार छीन लेगी जमीन ! 45 दिनों के अंदर जमाबंदी हो जाएगा रद्द; विभाग ने जारी किया आदेश

राज्य में सरकारी जमीन को अवैध कब्जे और गलत जमाबंदी से मुक्त कराने के लिए सरकार ने बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब पूर्व में की गई संदिग्ध व अवैध जमाबंदियों को तय समय सीमा के भीतर रद किया जाएगा। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इस पूरी प्रक्रिया को 45 दि

 illegal jamabandi : बिहार में इन लोगों से सरकार छीन लेगी जमीन ! 45 दिनों के अंदर जमाबंदी हो जाएगा रद्द; विभाग ने जारी किया आदेश
Tejpratap
Tejpratap
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illegal jamabandi : राज्य में सरकारी जमीन को अतिक्रमण और अवैध हस्तांतरण से मुक्त कराने के लिए सरकार ने सख्त कदम उठाया है। पूर्व में जिन सरकारी जमीनों की गलत, संदिग्ध या अवैध तरीके से जमाबंदी कायम कर दी गई थी, उन्हें अब एक-एक कर रद किया जाएगा। इस पूरी कार्रवाई को समय-सीमा में बांध दिया गया है, ताकि वर्षों से लंबित मामलों का त्वरित निष्पादन हो सके।


इस संबंध में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) सीके अनिल ने सभी प्रमंडलीय आयुक्त, समाहर्ता और अपर समाहर्ता को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। बुधवार को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि जिले के अपर समाहर्ता सरकारी भूमि के अवैध हस्तांतरण से संबंधित शिकायत, आवेदन अथवा स्वतः संज्ञान में आए मामलों का 45 दिनों के भीतर निष्पादन सुनिश्चित करेंगे।


अभियान की दूसरी कड़ी शुरू

पत्र में उल्लेख किया गया है कि इससे पहले मुख्य सचिव द्वारा सरकारी भूमि के अवैध हस्तांतरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए जा चुके हैं। अब इस अभियान की दूसरी कड़ी के तहत पूर्व में निर्गत गलत, संदिग्ध अथवा अवैध जमाबंदी को रद करने की जिम्मेदारी अपर समाहर्ता को सौंपी गई है। अपर समाहर्ता विधिवत वाद प्रारंभ कर निर्धारित 45 दिनों की प्रक्रिया में ऐसी जमाबंदी को रद करेंगे।


सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्ष 1974 के बाद की गई अवैध जमाबंदी के मामलों में जिस अंचलाधिकारी (सीओ) के कार्यकाल में यह गड़बड़ी हुई है, उसके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। इससे प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय होगी और भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं पर अंकुश लगेगा।


समाहर्ताओं पर सतत निगरानी की जिम्मेदारी

सरकार ने सभी समाहर्ताओं को इस पूरे अभियान की सतत निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी है। समाहर्ता यह सुनिश्चित करेंगे कि जिले में चिन्हित सभी मामलों का समय-सीमा के भीतर निष्पादन हो और किसी स्तर पर लापरवाही न बरती जाए। इसका उद्देश्य सरकारी भूमि की रक्षा के साथ-साथ उसे पुनः सरकार अथवा संबंधित विभाग के खाते में वापस लाना है।


किन जमीनों पर होगा निर्णय

निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किन-किन श्रेणियों की जमीनों की जमाबंदी की जांच कर निर्णय लिया जाएगा। इनमें शामिल हैं—गैर मजरूआ आम एवं कैसरे हिंद श्रेणी में दर्ज वे जमीनें, जिन पर पूर्व में सरकार द्वारा विधिसम्मत बंदोबस्ती या पट्टा निर्गत नहीं किया गया हो। वे जमीनें जिनके संबंध में जिला परिषद, नगर परिषद, नगर निगम, ग्राम पंचायत आदि के होने का दस्तावेज या अभिलेख उपलब्ध हो। राज्य सरकार के किसी भी विभाग, बोर्ड या निगम, जैसे बियाडा (BIADA) से संबंधित जमीनें। भारत सरकार के किसी मंत्रालय या संस्थान से संबंधित भूमि। धार्मिक न्यास पर्षद, वक्फ बोर्ड, सरकारी या अर्द्धसरकारी मान्यता प्राप्त गोशाला आदि से संबंधित जमीनें।इन सभी मामलों में केडस्ट्रल और रिवीजनल सर्वे में दर्ज सरकारी भूमि की वापसी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है।


तय की गई स्पष्ट प्रक्रिया

सरकार ने पूरी कार्रवाई के लिए चरणबद्ध और समयबद्ध प्रक्रिया भी तय कर दी है— 1. संतुष्टि के बाद वाद प्रारंभ करना – आवेदन प्राप्त होने के तीन कार्य दिवस के भीतर। 2. विधि सम्मत सूचना निर्गत करना – सात कार्य दिवस के अंदर। 3. सूचना का तामिला – सात कार्य दिवस के भीतर। 4. वाद की सुनवाई (तीन चरणों में) – कुल 15 कार्य दिवस के अंदर। 5. सुनवाई के बाद लिखित वक्तव्य – सात कार्य दिवस में। 6. अंतिम आदेश पारित कर आरसीएमएस पोर्टल पर अपलोड – सात कार्य दिवस के भीतर। इस तरह पूरी प्रक्रिया अधिकतम 45 दिनों में पूरी करनी अनिवार्य होगी। सरकार का मानना है कि इस अभियान से न केवल सरकारी जमीन की वापसी संभव होगी, बल्कि अंचल स्तर पर भूमि बैंक का भी सृजन किया जा सकेगा। इससे भविष्य में विकास कार्यों, औद्योगिक निवेश और सार्वजनिक उपयोग की योजनाओं के लिए जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।


राज्य सरकार के इस फैसले को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और हेराफेरी करने वालों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है। समय-सीमा तय होने और जिम्मेदारी निर्धारित किए जाने से अब मामलों को लटकाने की गुंजाइश कम रह जाएगी। आने वाले दिनों में इस अभियान के तहत बड़ी संख्या में अवैध जमाबंदियों के रद होने की संभावना है, जिससे सरकारी भूमि की रक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।