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Bihar IAS Transfer : टेंडर घोटाला, ईडी जांच और तबादला... क्या महज संयोग है आनंद किशोर की विदाई? सत्ता के करीबी अफसर की विदाई पर चर्चाओं का बाजार गर्म

बिहार बोर्ड के अध्यक्ष पद से वरिष्ठ आईएएस आनंद किशोर की विदाई ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। टेंडर घोटाले की जांच के बीच हुए इस बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि यह महज तबादला है या कोई बड़ा संकेत।

Bihar IAS Transfer : टेंडर घोटाला, ईडी जांच और तबादला... क्या महज संयोग है आनंद किशोर की विदाई? सत्ता के करीबी अफसर की विदाई पर चर्चाओं का बाजार गर्म
Tejpratap
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Bihar IAS Transfer : बिहार की नौकरशाही में हुए ताजा फेरबदल ने एक बार फिर कई सवालों को जन्म दे दिया है। वर्षों से बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (बीएसईबी) के सर्वेसर्वा रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आनंद किशोर को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह पूर्व पटना डीएम त्यागराजन एसएम को नई जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता सकती है, लेकिन क्या सचमुच यह सिर्फ एक रूटीन तबादला है? या फिर इसके पीछे कोई ऐसी कहानी है जिसकी परतें अभी खुलनी बाकी हैं?


आनंद किशोर उन चुनिंदा अधिकारियों में गिने जाते रहे हैं जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद अफसरों में शामिल माना जाता है। बिहार बोर्ड में उनके कार्यकाल के दौरान परीक्षा व्यवस्था में कई बड़े बदलाव हुए। नकल पर रोक, समय पर रिजल्ट और तकनीकी सुधारों के कारण उनकी कार्यशैली की प्रशंसा भी हुई। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक चल रहा था तो फिर अचानक उन्हें बोर्ड अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी क्यों पड़ी?


दरअसल, पिछले कुछ महीनों से बिहार का चर्चित टेंडर घोटाला लगातार सुर्खियों में है। इस मामले में ठेकेदार ऋषुश्री उर्फ रंजन सिन्हा की गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों ने कई चौंकाने वाले दावे किए। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और विशेष निगरानी इकाई (एसवीयू) की जांच में कई प्रभावशाली नाम सामने आए। इसी दौरान आनंद किशोर का नाम भी चर्चाओं में आ गया।


जांच रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि आरोपी मुमुक्षु चौधरी ने पूछताछ के दौरान नगर आयुक्त की पोस्टिंग के लिए कथित तौर पर 25 लाख रुपये की डील का जिक्र किया था। हालांकि यह बात अभी जांच और कानूनी प्रक्रिया के दायरे में है तथा किसी अदालत ने इन आरोपों की पुष्टि नहीं की है। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी अधिकारी का नाम इस तरह की चर्चाओं में आने लगे तो क्या सरकार के लिए उसे संवेदनशील पद पर बनाए रखना आसान रह जाता है?


राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आनंद किशोर को पूरी तरह से साइडलाइन नहीं किया गया है। वे अभी भी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में अपर मुख्य सचिव के महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि सरकार को उन पर पूरा भरोसा है तो फिर बिहार बोर्ड जैसी अहम जिम्मेदारी क्यों वापस ली गई? और अगर भरोसा नहीं है तो फिर दूसरे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी क्यों बरकरार रखी गई?


यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला केवल प्रशासनिक फेरबदल से आगे बढ़कर राजनीतिक संदेश का रूप लेता दिखाई देता है। बिहार में अक्सर बड़े अधिकारियों के तबादले सत्ता के संकेत माने जाते हैं। ऐसे में आनंद किशोर की विदाई को भी उसी नजर से देखा जा रहा है।


दूसरी तरफ नए अध्यक्ष त्यागराजन एसएम की नियुक्ति भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पटना डीएम के रूप में उनकी छवि एक सख्त और परिणाम देने वाले अधिकारी की रही है। अब उन्हें बिहार बोर्ड की जिम्मेदारी देकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है? क्या परीक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने का लक्ष्य है या फिर बोर्ड की छवि पर लगे सवालों को खत्म करने की कोशिश?


एक और सवाल यह भी है कि टेंडर घोटाले की जांच आखिर कहां तक पहुंचेगी। क्या जांच केवल ठेकेदारों और बिचौलियों तक सीमित रहेगी या फिर उन अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों तक भी जाएगी जिनके नाम जांच के दौरान सामने आए हैं? बिहार की जनता भी यह जानना चाहती है कि करोड़ों रुपये के कथित खेल में आखिर असली जिम्मेदार कौन हैं।


दिलचस्प बात यह है कि सरकार और जांच एजेंसियां फिलहाल अपने-अपने स्तर पर काम कर रही हैं, लेकिन राजनीतिक विपक्ष इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा। आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक गरमा सकता है। खासकर तब, जब जांच में नए खुलासे सामने आएंगे।


फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि आनंद किशोर का बिहार बोर्ड से हटना महज एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है। इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह केवल नियमित तबादला है? क्या टेंडर घोटाले की जांच का दबाव इसके पीछे है? क्या सरकार कोई बड़ा संदेश देना चाहती है? या फिर यह आने वाले समय में किसी और बड़े घटनाक्रम की भूमिका है?इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना तय है कि बिहार की नौकरशाही में हुआ यह बदलाव आने वाले दिनों में सत्ता, सिस्टम और जांच एजेंसियों के रिश्तों पर नई बहस को जन्म देता रहेगा।