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आतंकवादियों की धमकी से डरकर पुलिसवाले ने छोड़ी ड्यूटी, हाई कोर्ट ने कहा..इस देश को भगवान ही बचाए

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने आतंकवादी धमकियों के कारण ड्यूटी पर न लौटने वाले पूर्व SPO की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यदि पुलिसकर्मी डरकर सेवा छोड़ देंगे तो देश को भगवान ही बचा सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर
आतंकियों की धमकी से ड्यूटी छोड़ने वाले पूर्व SPO की याचिका खारिज
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
4 मिनट

DESK: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने आतंकवादियों की धमकी के कारण ड्यूटी पर वापस न लौटने वाले एक पूर्व विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुलिस अधिकारी आतंकवादियों से डरकर अपनी सेवाएं देने से इनकार करने लगें, तो देश को भगवान ही बचा सकता है।


न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ ने 10 अगस्त को दिए गए आदेश में कहा कि आतंकवादी धमकियों का हवाला देकर ड्यूटी पर न लौटना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।


क्या है मामला?

याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 2012 में विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) के रूप में हुई थी। उसने अदालत को बताया कि वर्ष 2015 में मेडिकल अवकाश के दौरान उसके क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी और उसे आतंकवादियों से जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं। इन धमकियों के डर से वह ड्यूटी पर वापस नहीं लौटा। बाद में जब उसने दोबारा अपनी पोस्टिंग वाली जगह पर जॉइन करने की कोशिश की, तो उसे अनुमति नहीं दी गई। 


इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। वर्ष 2025 में अदालत ने जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (DGP) को उसकी याचिका पर विचार कर उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया था। DGP द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने फिर हाईकोर्ट में अपील दायर की।


पूर्व SPO के तर्क

याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए कहा कि उसे हटाने से पहले न तो कोई औपचारिक आरोप तय किया गया, न विभागीय जांच कराई गई और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। उसने संविधान के अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 311 के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस नियम 359 के उल्लंघन का भी हवाला दिया।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने याचिकाकर्ता के सभी तर्क खारिज कर दिए। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिनियम की धारा 19 के तहत SPO को सामान्य पुलिस अधिकारियों जैसी कुछ शक्तियां जरूर प्राप्त होती हैं, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वे किसी वैधानिक नियमों से संचालित सिविल पद पर नियुक्त सरकारी कर्मचारी हैं। इसलिए उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों की तरह औपचारिक जांच या सुनवाई का वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।


अदालत ने यह भी कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अधिकार था, तब भी आतंकवादियों की धमकी के डर से ड्यूटी पर न लौटने की उसकी स्वयं की स्वीकारोक्ति सेवा से मुक्त करने के लिए पर्याप्त आधार है। ऐसी स्थिति में कारण बताओ नोटिस या सुनवाई का अवसर देना केवल एक औपचारिकता भर होता।


अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने वाले पुलिसकर्मी ही आतंकवादियों की धमकियों के आगे झुक जाएंगे, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना असंभव हो जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने पूर्व विशेष पुलिस अधिकारी की याचिका पूरी तरह खारिज कर दी।




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