Bihar Crime News: बिहार में सरकारी अस्पतालों की दवाओं की चोरी और अवैध तस्करी से जुड़े एक बड़े और संगठित रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। पटना पुलिस ने एक ऐसे अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय गिरोह का खुलासा किया है, जो लंबे समय से सरकारी अस्पतालों से जीवनरक्षक और प्रतिबंधित दवाएं चुराकर उन्हें अवैध तरीके से अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ बांग्लादेश तक पहुंचा रहा था। इस पूरे नेटवर्क का कथित मास्टरमाइंड नीरज कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
वैशाली जिले के हाजीपुर से पकड़े गए नीरज कुमार से पूछताछ में कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। पुलिस जांच में पता चला है कि यह गिरोह पिछले चार से पांच सालों से सुनियोजित तरीके से इस अवैध धंधे को चला रहा था। इसमें करीब 20 से 25 लोग शामिल थे, जो अलग-अलग स्तर पर काम कर पूरे नेटवर्क को संभालते थे। किसी की जिम्मेदारी दवाओं की चोरी की थी, तो कोई उनके भंडारण और सप्लाई का काम देखता था, जबकि कुछ लोग इन्हें बाजार तक पहुंचाने की भूमिका निभाते थे।
पूछताछ के दौरान नीरज कुमार ने बताया कि पहले यह पूरा नेटवर्क दिल्ली से संचालित होता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपना ठिकाना बदल लिया और हाजीपुर को मुख्य केंद्र बना लिया। हाजीपुर से ही पटना और आसपास के जिलों में प्रतिबंधित कफ सिरप, नशीले इंजेक्शन और सांप के काटने के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीवेनम जैसी महत्वपूर्ण दवाओं की अवैध सप्लाई की जाती थी। इन दवाओं को सरकारी अस्पतालों से चुराकर अलग-अलग माध्यमों से बाजार में खपाया जाता था।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश में एंटीवेनम दवाओं की भारी मांग रहती है। इसी मांग का फायदा उठाकर यह गिरोह सरकारी अस्पतालों से चोरी की गई दवाओं को ऊंचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाता था। यह पूरा नेटवर्क इतना संगठित था कि इसे एक छोटे-से माफिया ढांचे की तरह चलाया जा रहा था, जिसमें हर व्यक्ति की भूमिका पहले से तय थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह ने अपने पूरे कामकाज को तीन अलग-अलग स्तरों में बांट रखा था। पहला स्तर दवाओं की उपलब्धता और उनकी चोरी से जुड़ा था, जहां से असली खेल की शुरुआत होती थी। दूसरा स्तर पटना में सक्रिय था, जहां यह तय किया जाता था कि चोरी की गई दवाओं को किस तरह बाजार में उतारा जाएगा और किन चैनलों के जरिए इन्हें आगे भेजा जाएगा। तीसरा स्तर ग्रामीण इलाकों में गोदामों की व्यवस्था करता था, जहां इन दवाओं को छिपाकर रखा जाता था ताकि किसी को शक न हो।
इन गोदामों को किराए पर देने वाले लोगों को इसके बदले मोटी रकम दी जाती थी। वहीं, इस नेटवर्क ने माल की ढुलाई के लिए ट्रांसपोर्ट कंपनियों और स्थानीय वाहन चालकों का भी सहारा लिया था। कई ई-रिक्शा और ऑटो चालकों को सामान्य किराए से डेढ़ गुना या उससे भी ज्यादा भुगतान किया जाता था, ताकि वे बिना सवाल किए इस अवैध माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाते रहें।
पटना और आसपास के इलाकों में की गई छापेमारी के दौरान पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। इस कार्रवाई में करीब 20 करोड़ रुपये मूल्य की प्रतिबंधित दवाएं, नशीले इंजेक्शन और सरकारी अस्पतालों से चोरी की गई एंटीवेनम दवाएं बरामद की गई हैं। यह बरामदगी बिहार में दवा तस्करी के मामलों में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है।
पुलिस का यह भी कहना है कि इस मामले में पहले ही सात अन्य लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। अब जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में लगी हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर सरकारी अस्पतालों से इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं बाहर कैसे निकल रही थीं और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका थी।




