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Bihar Caste Survey : बिहार में लव -कुश या यादव नहीं बल्कि इस कास्ट के लोग हैं सबसे गरीब, रहने के घर तक की नहीं है व्यवस्था; जेडीयू MLC के डाटा से हलचल तेज

बिहार विधान परिषद में जाति सर्वे के आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य वर्ग में आवासहीन परिवारों का प्रतिशत एससी-एसटी से अधिक पाया गया, जिससे राजनीति गरमा गई है।

Bihar Caste Survey : बिहार में लव -कुश या यादव नहीं बल्कि इस कास्ट के लोग हैं सबसे गरीब, रहने के घर तक की नहीं है व्यवस्था; जेडीयू MLC के डाटा से हलचल तेज
Tejpratap
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Bihar Caste Survey : बिहार की राजनीति में लंबे समय से पिछड़ों और दलितों की आर्थिक स्थिति को लेकर बहस होती रही है, लेकिन इस बार विधान परिषद में पेश सरकारी आंकड़ों ने एक अलग ही तस्वीर सामने रख दी। बजट चर्चा के दौरान जदयू एमएलसी नीरज कुमार ने जाति आधारित गणना रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि राज्य में सामान्य वर्ग (सवर्ण) की स्थिति कई मानकों पर अपेक्षा से अधिक चिंताजनक है। उनके अनुसार, आवासहीन परिवारों के प्रतिशत के मामले में सामान्य वर्ग अन्य कई वर्गों से आगे है।


सदन में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक बिहार में सामान्य वर्ग के 0.31 फीसदी लोग आवासहीन हैं। इसके मुकाबले ओबीसी वर्ग में 0.30 फीसदी, अनुसूचित जनजाति में 0.28 फीसदी, अनुसूचित जाति में 0.26 फीसदी और पिछड़ा वर्ग में 0.16 फीसदी लोग बेघर हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि जिस वर्ग को आमतौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत माना जाता है, उसके भीतर भी एक बड़ा तबका आज बुनियादी जरूरत—छत—से वंचित है।


नीरज कुमार ने सदन में कहा कि जाति सर्वे ने समाज का वास्तविक आईना दिखाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सराहना करते हुए कहा कि सर्वे के आधार पर सरकार अब अधिक सटीक और लक्षित नीतियां बना पा रही है। उनके अनुसार, राज्य सरकार की योजनाओं का उद्देश्य किसी एक वर्ग को नहीं, बल्कि सभी जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाना है।


उन्होंने ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ का जिक्र करते हुए बताया कि इस योजना के तहत 1.81 करोड़ महिलाओं के खातों में 18,100 करोड़ रुपये की राशि भेजी गई है। उनका दावा था कि इस तरह की योजनाओं का सबसे अधिक लाभ पिछड़े और वंचित वर्गों को मिला है, जिससे सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है।


हालांकि, सवर्णों के बीच आवासहीनता के आंकड़ों ने नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। बिहार सवर्ण आयोग ने सरकार से मांग की है कि बेघर सवर्ण परिवारों को घर बनाने के लिए 5 डिसमिल जमीन उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के युवाओं को सरकारी नौकरियों में अधिकतम आयु सीमा में छूट देने की सिफारिश भी की गई है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये आंकड़े बिहार की सामाजिक संरचना में बदलती आर्थिक वास्तविकताओं की ओर इशारा करते हैं। लंबे समय से चली आ रही धारणा कि सवर्ण वर्ग पूरी तरह संपन्न है, अब चुनौती के घेरे में है। यदि सामान्य वर्ग का एक हिस्सा वास्तव में बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, तो नीति निर्माण में आर्थिक मानदंडों को और अधिक महत्व देने की जरूरत महसूस की जा सकती है।


विधान परिषद में इस मुद्दे के उठने के बाद विपक्षी दल भी सतर्क हो गए हैं। आने वाले दिनों में ‘गरीब सवर्ण’ का सवाल बिहार की राजनीति में प्रमुख मुद्दा बन सकता है। अब देखना होगा कि सरकार इन आंकड़ों के आधार पर किस तरह की नई योजनाएं या संशोधन लाती है और क्या सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है।