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25-Aug-2025 12:05 PM
By First Bihar
Ganesh Chaturthi 2025: गणेश चतुर्थी 2025 इस बार 27 अगस्त, बुधवार को पूरे देश में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी। यह त्योहार भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है और हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इस दिन भक्तगण अपने घरों, पंडालों और संस्थानों में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करते हैं।
कई लोग इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि गणेश मूर्ति खरीदने का शुभ समय (मुहूर्त) क्या होता है। दरअसल, मूर्ति लाने का दिन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना उसकी स्थापना का। इस बार गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले यानी 26 अगस्त (हरतालिका तीज) को भी शुभ चौघड़िया मुहूर्त में गणपति बप्पा को घर लाया जा सकता है।
26 अगस्त मूर्ति लाने का समय
सुबह 9:09 AM से दोपहर 1:59 PM तक।
27 अगस्त गणेश चतुर्थी पर मूर्ति लाने के शुभ मुहूर्त
सुबह 7:33 AM – 9:09 AM
सुबह 10:46 AM – दोपहर 12:22 PM
गणेश मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त
ज्योतिष अनुसार, भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था, इसीलिए गणेश चतुर्थी पर स्थापना का सर्वश्रेष्ठ समय मध्याह्न काल ही माना जाता है।
स्थापना मुहूर्त
11:05 AM से 1:40 PM (27 अगस्त 2025)
इस दौरान पूजा और स्थापना करने से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गणेश मूर्ति की स्थापना किस दिशा में करें?
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को घर का सबसे शुभ और पवित्र स्थान माना जाता है। यही कारण है कि गणपति की मूर्ति हमेशा इसी दिशा में स्थापित करनी चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और घर में शांति बनी रहती है।
गणेश मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखने योग्य बातें
मिट्टी की मूर्ति लें – यह पर्यावरण के अनुकूल होती है और विसर्जन के बाद जल प्रदूषण नहीं करती।
सूंढ बाईं ओर हो – यह सौम्यता और सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
बैठे हुए गणपति शुभ होते हैं – ये स्थिरता और शांति का प्रतीक हैं।
सिंदूरी या सफेद रंग की मूर्ति चुनें – ये रंग मानसिक शांति, ऊर्जा और सफलता से जुड़े हैं।
खंडित मूर्ति न लें – खंडित मूर्ति को पूजा में उपयोग नहीं किया जाता और इसे अशुभ माना जाता है।
गणपति बप्पा को "विघ्नहर्ता" कहा जाता है। इस दिन घर में उनकी स्थापना कर विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और नई शुरुआत में सफलता प्राप्त होती है। यह पर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक भी है।