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17-Nov-2025 11:40 AM
By First Bihar
Bihar Politics: बिहार या देश की राजनीति में चुनाव आते ही परिवारवाद का मुद्दा उभर कर सामने आता है। हर पार्टी पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने नेताओं के परिवारजनों को टिकट दिया या अपने करीबी रिश्तेदारों को आगे बढ़ाया। विपक्ष इस मामले में अक्सर हमलावर रहता है, लेकिन खुद की जिम्मेदारी से भागता है। इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भी परिवारवाद का असर नजर आया। NDA में JDU और BJP दोनों के 11-11 विधायक राजनीतिक परिवार से जुड़े हुए हैं। यह दर्शाता है कि सत्ता में पहुँचने के लिए परिवारिक संबंधों का महत्व अब भी मजबूत है।
दरअसल, जीतन राम मांझी की पार्टी HAM में परिवारवाद का प्रभाव सबसे अधिक देखने को मिला। HAM को NDA की ओर से 6 सीटें मिली थीं, जिनमें से 5 पर परिवारवादियों को टिकट दिया गया। मांझी की बहू, समधन और दामाद चुनाव जीतकर विधायक बने। बहू दीपा कुमारी गया के इमामगंज, समधन ज्योति देवी गया के बाराचट्टी और दामाद प्रफुल्ल मांझी जमुई के सिकंदरा से चुनाव जीतकर विधान सभा पहुंचे। इस तरह HAM के 6 में से 5 सीटों पर 80% विधायक परिवार से जुड़े हैं।
BJP में भी परिवारवाद नजर आया। पार्टी ने कुल 101 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 89 सीटें जीतकर भाजपा को मिली। इन जीतने वाले 11 विधायक (12.35%) राजनीतिक परिवार से हैं। इनमें सम्राट चौधरी, नीतीश मिश्रा और श्रेयसी सिंह जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। जदयू ने 101 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, जिसमें 85 जीत दर्ज की। पार्टी के 11 (12.9%) विधायक किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हुए हैं। इसमें अनंत सिंह, ऋतुराज कुमार और चेतन आनंद जैसे नाम शामिल हैं। पूर्व सांसद प्रो. अरुण कुमार के बेटे और भतीजा भी विधायक बने हैं। प्रो. अरुण कुमार ने जहानाबाद के घोषी और अतरी सीट से अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाया।
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपनी पत्नी स्नेहलता को सासाराम सीट से चुनाव जितवाया। इसके अलावा उन्होंने नीतीश सरकार में मंत्री संतोष सिंह के भाई आलोक कुमार सिंह को दिनारा सीट से टिकट दिलाया। RLM के चार विधायक बने, जिनमें से दो (50%) राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं।
चिराग पासवान की पार्टी LJP R को 19 सीटें मिली। इसने बाहुबली राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी को गोविंदगंज सीट से टिकट दिया और वह जीत गए। वहीं विपक्षी दलों की ओर देखें तो राजद के 25 उम्मीदवारों में से 5 (20%) नेताओं के रिश्तेदार थे। इसमें तेजस्वी यादव के बेटे, पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पोती करिश्मा राय, पूर्व मंत्री जगदीश शर्मा के बेटे राहुल कुमार और पूर्व सांसद राजेश कुमार के बेटे कुमार सर्वजीत शामिल हैं।
इन्हीं कारणों से ऐसा माना जाता है कि राजनीति अब पेशे का रूप ले चुकी है। इसलिए पुराने नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट देना आम हो गया है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता ज्ञान रंजन ने कहा कि NDA खुद परिवारवाद करती है और विपक्ष पर आरोप लगाती है, जबकि इस बार के चुनाव में कई NDA विधायक परिवारवाद की वजह से बने हैं।
BJP प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने अपनी पार्टी का पक्ष रखते हुए कहा कि भाजपा में कोई परिवार पूरी पार्टी को नियंत्रित नहीं करता। अगर कोई दूसरी पीढ़ी राजनीति में आती है तो वह सेवा भाव से आती है। वहीं, कांग्रेस और राजद में परिवारवाद अधिक देखने को मिलता है।