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30-Jul-2025 12:50 PM
By First Bihar
Premanand Maharaj: प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज जी ने अपने प्रवचन में जीवन की सच्ची प्रसन्नता और अध्यात्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वास्तविक सुख केवल भगवान से संबंध स्थापित करने पर ही प्राप्त हो सकता है। उन्होंने भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा “ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति, सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।” इसका तात्पर्य है कि जो आत्मा ब्रह्म में स्थित हो जाती है, वह न तो शोक करती है और न ही किसी वस्तु की कामना। वह परम प्रसन्नता को प्राप्त कर लेती है।
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म का तात्पर्य केवल निराकार नहीं, बल्कि भगवान राम, भगवान कृष्ण जैसे साकार रूपों में भी है। जब व्यक्ति का मन भगवान में स्थिर हो जाता है, तब वह माया जनित वस्तुओं से उत्पन्न क्षणिक हर्ष से ऊपर उठकर अखंड आनंद की स्थिति में पहुँचता है।
उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यदि हमें कोई प्रिय वस्तु या व्यक्ति मिल जाता है – जैसे कोई नई गाड़ी या बिछड़ा हुआ मित्र तो एक क्षणिक हर्ष उत्पन्न होता है। लेकिन यही हर्ष जब गाड़ी के एक्सीडेंट या प्रिय व्यक्ति के बिछड़ने में बदलता है, तो वही शोक का कारण बनता है। उन्होंने कहा, “हर्ष का परिणाम शोक है, जबकि प्रसन्नता अखंड होती है, और यह केवल भगवान से जुड़ने पर मिलती है।”
महाराज जी ने आगे कहा कि भगवान से प्रेम करने पर जीवन में सच्चा आनंद आता है, क्योंकि भगवान अविनाशी, शुद्ध, चैतन्य और आनंदरूप हैं। सांसारिक वस्तुएं जैसे धन, रिश्ते, और भोग केवल अस्थायी सुख दे सकते हैं, स्थायी प्रसन्नता नहीं। उन्होंने बताया कि कई लोग उनके पास आकर यही कहते हैं कि “हमारे पास सब कुछ है, लेकिन भीतर शांति नहीं है।” यह इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में भगवान को स्थान नहीं दिया।
प्रेमानंद महाराज ने नाम जप और भजन को जीवन का आधार बताते हुए कहा कि “जितना नाम जप करोगे, उतना ही प्रसन्न रहोगे। चाहे जैसी भी परिस्थिति हो, यदि भगवान का भजन नहीं है तो जीवन में स्थायी प्रसन्नता नहीं आ सकती, यह पक्की बात है।”
उन्होंने आधुनिक जीवनशैली पर चिंता जताते हुए कहा कि आज लोग डिप्रेशन में इसलिए जा रहे हैं क्योंकि उनमें भगवान का भरोसा और बल नहीं रह गया है। गंदा खानपान, नकारात्मक सोच और गहरे स्तर पर ईश्वर से दूरी के कारण वे मानसिक रूप से अशांत हो जाते हैं और भयभीत रहने लगते हैं। अंत में महाराज जी ने सबको संदेश दिया कि "भगवान से प्रेम करो, नाम जपो, भजन करो। यही जीवन का सच्चा आधार है, यही मन की शांति का उपाय है।"