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23-Nov-2025 08:35 AM
By First Bihar
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण टिप्पणी किया है, जिसमें देश की सभी महिलाओं, विशेषकर हिंदू महिलाओं, से अपील की कि वे अपनी संपत्ति की वसीयत (Will) अवश्य बनाएं, ताकि उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति को लेकर मायके और ससुराल पक्ष के बीच होने वाले अनावश्यक विवाद से बचा जा सके। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में महिला के निधन के बाद उसकी स्वयं अर्जित और विरासत में मिली संपत्ति पर दोनों पक्षों में गंभीर विवाद पैदा हो जाते हैं, जिससे परिवार टूट जाते हैं और लंबी कानूनी लड़ाइयाँ शुरू हो जाती हैं।
हिंदू महिलाओं से सुप्रीम कोर्ट की अपील
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान की। पीठ ने कहा कि “हम सभी महिलाओं से, विशेषकर हिंदू महिलाओं से अपील करते हैं कि वे तुरंत एक वसीयत तैयार करें, ताकि उनकी संपत्ति का बंटवारा उनकी इच्छा के अनुसार हो सके और परिवारों में विवाद न बढ़ें।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह इस याचिका पर फैसले से इनकार करती है और इस मुद्दे को किसी उपयुक्त मामले में भविष्य के लिए खुला छोड़ती है, क्योंकि यह जनहित याचिका के रूप में दायर की गई थी, न कि किसी प्रत्यक्ष पीड़ित पक्ष द्वारा।
धारा 15(1)(b) पर विवाद क्यों?
धारा 15(1)(b) के अनुसार, यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत (intestate) के मर जाती है और उसके पति, पुत्र या पुत्री नहीं हैं, तो उसकी संपत्ति पति के वारिसों को जाती है। माता-पिता को अधिकार तभी मिलता है जब पति का कोई वारिस मौजूद न हो। कई मामले इस बात के उदाहरण हैं कि महिला की स्वयं अर्जित संपत्ति होने के बावजूद, उसके माता-पिता को संपत्ति से वंचित होना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, व्यापार और संपत्ति के मामले में आत्मनिर्भर हैं, इसलिए यह स्थिति माता-पिता के लिए पीड़ादायक हो सकती है।
पीठ ने निर्देश दिया कि यदि किसी हिंदू महिला की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर मायके और ससुराल पक्ष के बीच विवाद हो और धारा 15(2) लागू न होती हो, तो मामले को पहले प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता (pre-litigation mediation) में भेजा जाएगा। मुकदमा केवल तभी दायर किया जा सकेगा जब मध्यस्थता विफल हो जाए। मध्यस्थता में हुआ समझौता अदालती डिक्री माना जाएगा।
कोर्ट की टिप्पणी: ‘कन्यादान’ और विवाह का गोत्र
सितंबर में हुई एक पिछली सुनवाई में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हिंदू विवाह पर टिप्पणी करते हुए कहा था। “हिंदू समाज हजारों साल के संस्कारों से नियंत्रित है। विवाह एक गोत्र से दूसरे गोत्र में संक्रमण (गोत्र दान) है। इसलिए माना जाता है कि विवाह के बाद महिला की जिम्मेदारी पति और उसके परिवार पर होती है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह के बाद महिला अपने भाई से भरण-पोषण नहीं मांगती और रीति-रिवाजों में उसका जीवनसाथी उसका प्राथमिक संरक्षक माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद क्या है?
कई याचिकाओं में इस बात को चुनौती दी गई है कि यदि बिना संतान वाली हिंदू महिला की बिना वसीयत मृत्यु हो जाए, तो उसकी संपत्ति केवल पति के परिवार को क्यों जाए? ऐसे ही एक मामले में कोविड-काल में मृत हुए एक दंपति की संपत्ति पर दोनों परिवारों की माताओं के बीच विवाद है। मृत युवती की मां का दावा है कि उसकी बेटी की स्वयं अर्जित संपत्ति उसे मिलनी चाहिए, जबकि मृत युवक की मां पूरे संपत्ति पर अधिकार जता रही है। एक अन्य मामले में, पति की बहन अपने दिवंगत बिना संतान वाले भाई-भाभी की संपत्ति पर दावा कर रही है, जबकि महिला के मायके पक्ष को इससे बाहर कर दिया गया है।
बिना वसीयत के मृत्यु के बाद कानूनी स्थिति
वकीलों ने तर्क दिया कि यदि महिला की बिना वसीयत मौत हो जाती है और प्रथम श्रेणी का वारिस (पति/संतान) नहीं है, तो पति के परिवार को अधिकार दिया जाना महिला की गरिमा (dignity) के विपरीत है, क्योंकि इससे उसके माता-पिता वंचित रह जाते हैं, जबकि संपत्ति उसकी स्वयं अर्जित होती है।
याचिकाकर्ताओं ने इसे असंवैधानिक बताया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल धारा 15 की संवैधानिकता पर कोई टिप्पणी नहीं की है और इसे भविष्य के लिए खुला छोड़ दिया है।