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18-Nov-2025 07:30 AM
By First Bihar
Bihar politics : बिहार की बदलती सियासत में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक वजूद और प्रभाव दिखा दिया है। विधानसभा भंग होने के बाद नई सरकार के गठन की तैयारियों के बीच जदयू और भाजपा के बीच ‘बराबरी की हिस्सेदारी’ को लेकर हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल गठन पर भाजपा नेतृत्व के सामने स्पष्ट रूप से अपनी शर्तें रख दी हैं। इन शर्तों का केंद्र है पदों पर बराबरी और हर महत्वपूर्ण नियुक्ति पर अंतिम अधिकार।
बीजेपी को अधिक हिस्सेदारी की उम्मीद, लेकिन नीतीश का ‘ना’
विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या जदयू से अधिक है, इसलिए भाजपा नेतृत्व सरकार में ज्यादा हिस्सेदारी की उम्मीद कर रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा चाहती है कि उपमुख्यमंत्री और प्रमुख मंत्रालयों में उसकी पकड़ मजबूत हो। लेकिन जैसे ही नीतीश कुमार को भाजपा की इस इच्छा का संकेत मिला, उन्होंने तुरंत इसे खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि सरकार में बराबरी सिर्फ संख्या से नहीं, गठबंधन की गरिमा से तय होगी। नीतीश कुमार के इस सख्त रुख ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को चौंका दिया। बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद यह पहली बार है जब भाजपा खुले तौर पर नीतीश कुमार के सामने ‘दबाव’ की स्थिति में दिखी।
‘बराबरी का फॉर्मूला’—नीतीश की नई सियासी चाल
जदयू सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल गठन से पहले ही भाजपा के सामने अपना ‘बराबरी फॉर्मूला’ स्पष्ट कर दिया है। यह फॉर्मूला तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है—
दो उपमुख्यमंत्री—एक जदयू से, एक भाजपा से
नीतीश कुमार नहीं चाहते कि उपमुख्यमंत्री का पद केवल भाजपा के पास हो। इसलिए उन्होंने मांग रखी है कि एक उपमुख्यमंत्री जदयू का भी होना चाहिए।
विधानसभा अध्यक्ष जदयू का, सभापति बीजेपी का
सत्ता संतुलन के तहत उन्होंने तय कर दिया है कि विधानसभा अध्यक्ष जदयू से होगा, जबकि विधान परिषद में सभापति भाजपा का नियुक्त किया जाए।
भाजपा उपमुख्यमंत्री पर ‘वीटो पावर’
यह सबसे अहम शर्त है। नीतीश की मांग है कि भाजपा की तरफ से जिसे भी उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा, उसकी नियुक्ति से पहले उनकी स्वीकृति अनिवार्य होगी। यानी उस नाम पर अंतिम मुहर नीतीश कुमार ही लगाएंगे। नीतीश की इस मांग को राजनीतिक गलियारों में ‘वीटो पावर’ कहा जा रहा है, जिससे साफ है कि वे गठबंधन में अपनी भूमिका को कमतर नहीं होने देना चाहते।
दिल्ली में आधी रात की हलचल, नेताओं को तुरंत बुलाया गया
नीतीश कुमार के इन संकेतों के बाद भाजपा के रणनीतिकार सक्रिय हो गए। सूत्र बताते हैं कि देर रात दिल्ली में हुई एक बैठक के बाद भाजपा नेतृत्व ने तुरंत चार्टर प्लेन भेजकर केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा को दिल्ली तलब किया।
इन नेताओं की मौजूदगी में दोनों दलों के बीच गतिरोध दूर करने की कोशिश की जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा शीर्ष नेतृत्व किसी भी कीमत पर गठबंधन में दरार नहीं चाहता, विशेषकर चुनावी माहौल के बाद बनी राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए।
नीतीश का संदेश—‘सत्ता में बराबरी, तभी सरकार स्थिर’
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की पहचान हमेशा से एक संतुलित और व्यावहारिक नेता की रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनके राजनीतिक फैसलों ने लोगों को कई बार चौंकाया भी है। इस बार भी उन्होंने साफ कर दिया है कि सरकार तभी चलेगी जब दोनों दल समान सम्मान और हिस्सेदारी के साथ आगे बढ़ेंगे। जदयू नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार कोई ‘दबाव’ नहीं बना रहे, बल्कि यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि गठबंधन में दोनों दलों की भूमिका स्पष्ट हो और भविष्य में किसी तरह का विवाद या असंतोष न पैदा हो।
भविष्य की तस्वीर—क्या बनेगा सामंजस्य?
इन घटनाओं के बाद बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। भाजपा और जदयू दोनों ही गठबंधन को जारी रखना चाहते हैं, लेकिन सत्ता संतुलन को लेकर विवाद ने तस्वीर धुंधली कर दी है। अगर भाजपा नीतीश की शर्तें मान लेती है, तो मंत्रिमंडल गठन का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन अगर भाजपा नेतृत्व ज्यादा हिस्सेदारी पर अड़ा रहा, तो गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत जारी है और उम्मीद की जा रही है कि अगले 24–48 घंटों में स्थिति साफ हो जाएगी। बिहार की जनता की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि नए राजनीतिक समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।
नीतीश कुमार का यह ‘बराबरी का फॉर्मूला’ उनके अनुभव, राजनीतिक पकड़ और गठबंधन की गतिशीलता को समझने की परिपक्वता का संकेत माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस चुनौती का कैसे जवाब देती है और बिहार की सत्ता में किस प्रकार का संतुलन स्थापित होता है।