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Bihar Election 2025: दोनों उपमुख्यमंत्रियों की साख दांव पर, सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा की प्रतिष्ठा बनी चुनौती; तेजस्वी के भी भविष्य का होगा फैसला

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए आज सुबह 7 बजे से वोटिंग शुरू होगी। इस बार का चुनाव सिर्फ सत्ता की कुर्सी के लिए नहीं, बल्कि कई दिग्गज नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा और भविष्य तय करने वाला साबित हो सकता है।

06-Nov-2025 06:47 AM

By First Bihar

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025  के लिए आज सुबह 7 बजे से वोटिंग शुरू होगी। इस बार का चुनाव सिर्फ सत्ता की कुर्सी के लिए नहीं, बल्कि कई दिग्गज नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा और भविष्य तय करने वाला साबित हो सकता है। इनमें सबसे प्रमुख नाम हैं।  बिहार के दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा। दोनों नेता बीजेपी के सीनियर चेहरों में शुमार हैं और इस बार अपने-अपने क्षेत्रों से पार्टी के सिंबल पर चुनाव मैदान में हैं। एक तरफ सम्राट चौधरी तारापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विजय कुमार सिन्हा लखीसराय विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं।


इन दोनों के मुकाबले सीधे तौर पर महागठबंधन के उम्मीदवारों से हैं, लेकिन असली लड़ाई "प्रतिष्ठा" और "साख" की कही जा रही है। वहीं विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव, जो महागठबंधन के मुख्यमंत्री चेहरा भी हैं, राघोपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। राघोपुर में तेजस्वी यादव के सामने भी कड़ा मुकाबला है, पर उनके लिए यह चुनाव सत्ता वापसी की सबसे बड़ी परीक्षा मानी जा रही है।


 सम्राट चौधरी: जातीय समीकरण और नेतृत्व की परीक्षा

बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी इस बार अपनी राजनीतिक विरासत और नेतृत्व क्षमता दोनों की परीक्षा में हैं। वे तारापुर विधानसभा सीट से मैदान में हैं, जो पारंपरिक रूप से जदयू और आरजेडी के प्रभाव वाली सीट रही है। सम्राट चौधरी ने बीजेपी की कमान संभालने के बाद पार्टी को न सिर्फ मजबूत किया बल्कि एनडीए गठबंधन में अपनी भूमिका को भी मज़बूती से पेश किया। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह अपने नेतृत्व का असर वोटों में बदलने में सफल होते हैं या नहीं।


तारापुर में इस बार मुकाबला काफी दिलचस्प है। यहां जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। यादव, कुशवाहा, भूमिहार और दलित वोटर्स की संख्या लगभग बराबर है, जिससे हर उम्मीदवार को हर समुदाय में पैठ बनानी होगी। सम्राट चौधरी की छवि एक आक्रामक नेता की रही है, जो सीधे मुख्यमंत्री लालू यादव पर निशाना साधने से नहीं कतराते। लेकिन सवाल यही है कि क्या तारापुर में उनकी यह आक्रामक शैली मतदाताओं को आकर्षित करेगी या विरोधियों के लिए हथियार बन जाएगी।


विजय कुमार सिन्हा: लखीसराय में फिर होगी प्रतिष्ठा की जंग

दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की लड़ाई भी कम अहम नहीं है। वे लखीसराय विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं, जहां से वह लगातार चुनाव जीतते आए हैं। विजय सिन्हा का गढ़ माना जाने वाला लखीसराय इस बार भी सियासी चर्चाओं में है क्योंकि यह सिर्फ विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि बीजेपी की संगठनात्मक ताकत की परीक्षा भी है।


विजय कुमार सिन्हा अपनी साफ-सुथरी छवि, जमीन से जुड़े नेतृत्व और संगठन के साथ तालमेल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए विपक्ष पर तीखे हमले किए थे, वहीं उपमुख्यमंत्री बनने के बाद वे सरकार के नीति पक्ष को मजबूती से प्रस्तुत कर रहे हैं। लखीसराय में महागठबंधन ने इस बार मजबूत प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को कड़ी चुनौती देने की कोशिश की है। जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे दोनों ही विजय सिन्हा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, इलाके में उनके कार्यकर्ताओं की मजबूत पकड़ और वर्षों की जनसंपर्क की बदौलत उन्हें बढ़त मिल सकती है।


तेजस्वी यादव: सत्ता में वापसी की अंतिम उम्मीद

इधर, बिहार के नेता प्रतिपक्ष और महागठबंधन के सीएम फेस तेजस्वी यादव की नज़र एक बार फिर राघोपुर विधानसभा सीट पर है। यह वही सीट है जहां से उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने भी राजनीति की शुरुआत की थी और अब तेजस्वी इसी सीट से लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर तीसरी बार वापसी की कोशिश कर रहे हैं।


राघोपुर सीट यादव बहुल इलाका है, लेकिन एनडीए इस बार वहां से दमदार चेहरे को उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना रही है। तेजस्वी के सामने चुनौती यह है कि क्या वे अपने 15 महीने के उपमुख्यमंत्री कार्यकाल में किए गए कामों को जनता के बीच प्रभावी ढंग से पेश कर पाएंगे या नहीं। तेजस्वी ने इस बार "महंगाई", "बेरोजगारी" और "कानून-व्यवस्था" के मुद्दे को मुख्य फोकस में रखा है, जबकि एनडीए सरकार विकास योजनाओं और केंद्र की उपलब्धियों को जनता के बीच रख रही है।


 एनडीए बनाम महागठबंधन: साख और रणनीति की लड़ाई

बिहार की राजनीति में यह चुनाव कई मायनों में खास है। इस बार एनडीए (भाजपा-जदयू) और महागठबंधन (राजद-कांग्रेस-लेफ्ट) के बीच मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता और गठबंधन की स्थिरता का भी है। जहां बीजेपी अपने दोनों डिप्टी सीएम को मैदान में उतारकर "डबल इंजन सरकार" की मजबूती दिखाना चाहती है, वहीं तेजस्वी यादव युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे पर जनता को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।


विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा अपनी-अपनी सीट जीतकर बीजेपी के वोट प्रतिशत को बढ़ा पाते हैं तो यह पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला साबित होगा। दूसरी ओर, अगर इनमें से किसी की भी सीट पर झटका लगता है, तो यह पूरे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।