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07-Nov-2025 03:09 PM
By First Bihar
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण का मतदान समाप्त हो चुका है। इस चरण में औसतन 60% से अधिक मतदान दर्ज किया गया है, जो राज्य में चुनावी उत्साह को दर्शाता है। इस चुनाव में जहां कुछ उम्मीदवार करोड़ों और अरबों की दौलत के मालिक हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे चेहरे भी सामने आए हैं जो आम जिंदगी से सीधे चुनावी मैदान में उतरे हैं।
इस कड़ी में सबसे चर्चित नाम है पीरपैंती विधानसभा सीट से बसपा के प्रत्याशी सुनील कुमार चौधरी का। 40 साल के सुनील कुमार चौधरी भागलपुर जिले के पीरपैंती विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं और वर्तमान में सबौर प्रखंड के खानकीतता पंचायत के मुखिया हैं। उन्होंने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई पीरपैंती से ही पूरी की है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपने नामांकन हलफनामे में सुनील कुमार चौधरी ने अपनी कुल संपत्ति “शून्य” बताई है। इसका अर्थ है कि उनके पास न कोई जमीन है, न घर-फ्लैट, न बैंक बैलेंस, न वाहन और न ही कोई ज्वेलरी। इसके अलावा उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं है।
वहीं, ADR (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ और उम्मीदवारों के पास भी संपत्ति बेहद कम है। गया जिले की वजीरगंज सीट से समाज पार्टी के प्रत्याशी सुरेश राजवंशी के पास केवल 1,100 रुपये की चल संपत्ति है और अचल संपत्ति शून्य है। मधुबनी के बेनीपट्टी से निर्दलीय प्रत्याशी पंकज कुमार राम और पूर्वी चंपारण के पिपरा क्षेत्र से निर्दलीय राजमंगल प्रसाद के पास भी केवल 2,000 रुपये की कुल संपत्ति दर्ज है।
पीरपैंती विधानसभा भागलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और यह आरक्षित सीट है। वर्तमान में इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3 लाख 77 हजार है, जिनमें पुरुष मतदाता 1,90,000 से अधिक और महिला मतदाता लगभग 1,85,000 हैं। थर्ड जेंडर मतदाता गिनी-चुनी संख्या में हैं।
इस सीट पर पहले कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस का कब्जा रहा। 2000 में पहली बार राजद का झंडा गड़ा, और आरजेडी के शोभाकांत मंडल ने तीन बार जीत दर्ज की। 2010 में भाजपा ने पहली बार यह सीट जीती। 2015 में राजद के रामविलास पासवान ने भाजपा को पटखनी दी। 2020 के चुनाव में भाजपा ने फिर से ललन कुमार को प्रत्याशी बनाया, जिन्होंने राजद के रामविलास पासवान को हराया।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सुनील कुमार चौधरी जैसे आम आदमी के चुनावी मैदान में उतरने से यह स्पष्ट होता है कि चुनाव सिर्फ धन और दौलत की लड़ाई नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास और उनके प्रतिनिधित्व के लिए भी है।