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31-Jan-2026 09:28 AM
By First Bihar
NEET student case Patna : बिहार की राजनीति में जनता अक्सर सत्ता की कमान अलग-अलग हाथों में सौंप देती है, लेकिन यही जनता सिस्टम को बदलने में असमर्थ रहती है। यह सिस्टम शायद अब एक आदत का शिकार हो चुका है – मामलों को रफा-दफा करने की, या साफ शब्दों में कहें तो सच दबाने की। हाल ही में पटना में हुए NEET छात्रा केस ने इस प्रणालीगत कमजोरी को फिर उजागर कर दिया है।
इस मामले की शुरुआत 5 जनवरी से हुई, जब पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहकर NEET की तैयारी कर रही छात्रा को अचेत अवस्था में पाया गया। उसे तुरंत प्रभात मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 6 से 8 जनवरी तक इलाज चला। हालत बिगड़ने पर छात्रा को 9 जनवरी को मेदांता अस्पताल शिफ्ट किया गया। 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस घटना को सामान्य या दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना मानकर टाल देना संभव नहीं है।
मामले की जटिलता तीन मुख्य कारणों से है। पहला, पुलिस की शुरुआती थ्योरी लगातार बदलती रही। दूसरा, हॉस्टल प्रशासन की भूमिका कई सवालों के घेरे में है। तीसरा, घटना में शामिल कुछ किरदारों के बारे में गंभीर संदेह हैं। शुरुआती जांच ने यौन हिंसा की संभावना से इनकार कर दिया, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इसके उलट कई अहम तथ्य उजागर किए।
पुलिस पर उठ रहे सवाल इसलिए भी अहम हैं क्योंकि शुरुआती दौर में उसने सीसीटीवी फुटेज, हॉस्टल वार्डन और डॉक्टरों के बयानों के आधार पर मामले को सामान्य घटना या आत्महत्या की श्रेणी में डाल दिया। तब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी नहीं आई थी। यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी गंभीर घटना में पुलिस ने इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई?
जांच में कई पहलुओं ने और भी सवाल खड़े किए। पुलिस ने बाद में एक गिरफ्तारियां भी कीं। यदि हॉस्टल और प्रशासन पर संदेह नहीं था, तो गिरफ़्तारी की क्या जरूरत थी? पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि छात्रा के शरीर पर चोट के कई निशान थे। गर्दन और कंधे के आसपास गहरे नाखून के निशान, छाती और कंधे के नीचे खरोंच, प्राइवेट पार्ट पर ताज़ा चोटें और जबरदस्ती का प्रमाण मिले। इससे यह भी साबित होता है कि पीड़िता बेहोश नहीं थी और उसने खुद को बचाने की कोशिश की।
इतिहास में बिहार में ऐसे मामले नई नहीं हैं। 1983 का बॉबी कांड इसकी याद दिलाता है। 11 मई 1983 को श्वेता निशा त्रिवेदी, जिन्हें बॉबी के नाम से जाना जाता था, की मौत हुई। शुरुआती जांच में इसे हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन पोस्टमार्टम ने पेट में ज़हर पाए जाने की बात सामने रखी। सवाल यह था कि ज़हर किसने दिया और क्यों? तत्कालीन पुलिस अधिकारी किशोर कुणाल ने मामला हत्या का बताया, लेकिन सत्ता के दबाव और राजनीतिक रसूक के कारण केस सीबीआई को सौंपा गया और अंततः इसे आत्महत्या करार दिया गया।
इसी प्रकार 1999 का शिल्पी-गौतम कांड भी पुलिस और सिस्टम की लापरवाही को दर्शाता है। 3 जुलाई 1999 को पटना के फ्रेजर रोड इलाके में शिल्पी गौतम और गौतम सिंह के शव मिले। शवों को जब्त करने और सही तरीके से जांच करने में पुलिस की बड़ी चूक हुई। कार को पुलिसकर्मी ने थाने ले जाने की वजह से संभावित फिंगरप्रिंट नष्ट हो गए। शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या बताया गया, लेकिन बाद में CBI की जांच में शिल्पी के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई।
बथानी टोला नरसंहार (11 जुलाई 1996) भी इसी पैटर्न का उदाहरण है। भोजपुर जिले में दलित बस्ती पर हमला हुआ, 21 लोग मारे गए। पुलिस ने गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की, FIR में खामियां रहीं और सबूत कमजोर थे। निचली अदालत ने सजा दी, लेकिन 2012 में पटना हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच कमजोर थी, गवाह भरोसेमंद नहीं थे और सबूत विरोधाभासी थे।
इन मामलों से एक पैटर्न साफ दिखाई देता है – सत्ता बदलती रही, सरकारें आईं-गईं, लेकिन सच दबाने और जांच को कमजोर करने का सिस्टम जस का तस बरकरार है। यही वजह है कि NEET छात्रा के मामले में न्याय मिलने की राह कठिन और अनिश्चित नजर आती है।
अब इस मामले की सीबीआई जांच होगी। सवाल यह उठता है कि क्या सीबीआई जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी, या पहले की तरह राजनीतिक दबाव और रसूक के चलते जांच कमजोर पड़ जाएगी। जनता की उम्मीद है कि इस बार दोषियों को सजा मिले और पीड़िता के परिवार को न्याय मिले।
इस घटना ने बिहार की जनता और प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। सिर्फ कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं, उसे लागू करने और जांच में पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। यदि NEET छात्रा को न्याय नहीं मिला, तो यह बिहार में सच की सामूहिक हत्या की परंपरा को और मजबूत कर देगा।
बिहार में ऐसे मामले दिखाते हैं कि अपराध और अपराधी से पहले सिस्टम की कमजोरियों और सत्ता की भागीदारी से सच दब जाता है। शंभू हॉस्टल केस ने फिर याद दिलाया कि अगर सिस्टम नहीं बदला, तो कितनी भी बड़ी घटना हो, वह दबकर रह जाएगी। इस बार सीबीआई जांच पर सबकी निगाहें हैं, ताकि न्याय का सिलसिला शुरू हो और बिहार में सिस्टम में सुधार की उम्मीद जगे।