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22-Jan-2026 08:29 AM
By First Bihar
husband time sharing : एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सोशल मीडिया और गांव-देहात की पंचायतों के अनोखे फैसलों को फिर से चर्चा में ला दिया है। मामला ऐसा है कि एक पति की दो पत्नियां हैं और दोनों ही अपने-अपने तरीके से पति को अपने पास ही रखना चाहती थीं। रोज़ाना के झगड़े, गुस्सा-हंगामा और परिवार में तनाव इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस तक पहुँच गया। लेकिन इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी गांव की पंचायत को सौंप दी गई—और पंचायत ने जो फैसला किया, वह सुनकर हर कोई हैरान रह गया।
पंचायत ने किया पति का “टाइम टेबल” बनाना
मामला यूपी के नगलिया आकिल गांव का है। यहां एक मुस्लिम युवक की दो पत्नियां हैं—पहली अरेंज मैरिज से और दूसरी लव मैरिज से। दोनों ही पत्नियां पति को अपने पास रखने के लिए जिद पर अड़ी हुई थीं। घर में लगातार झगड़ा, गाली-गलौज और तनाव बढ़ता जा रहा था। आखिरकार मामला पुलिस तक पहुँच गया। पुलिस ने इसे सुलझाने की जिम्मेदारी पंचायत को दे दी।
पंचायत ने दोनों पत्नियों और पति की बात सुनने के बाद एक अनोखा लेकिन सटीक फैसला किया। पंचायत ने पति के समय का बंटवारा तय कर दिया—यानी पति कब किस पत्नी के साथ रहेगा, इसका एक लिखित समझौता बनाया गया। और इस फैसले में एक बात सबसे ज्यादा हैरान करने वाली थी—सप्ताह में एक दिन पति को “एकांत” दिया गया।
क्या है पंचायत का फैसला?
पंचायत के फैसले के मुताबिक: सोमवार, मंगलवार और बुधवार: पति पहली पत्नी के साथ रहेगा। इसके बाद गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार: पति दूसरी पत्नी के साथ रहेगा। जबकि रविवार: पति को ‘साप्ताहिक अवकाश’ दिया गया, यानी वह दिन दोनों से दूर एकांत में रहेगा। इसके अलावा पंचायत ने यह भी कहा कि विशेष परिस्थितियों में एक दिन आगे-पीछे करने की गुंजाइश होगी। इस फैसले पर पति और दोनों पत्नियों के हस्ताक्षर भी कराए गए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद फिर न हो।
क्यों हुआ इतना बड़ा विवाद?
असल में झगड़े की वजह सिर्फ पति का समय नहीं था, बल्कि दोनों पत्नियों के बीच अहंकार, खुद की श्रेष्ठता और अधिकार की जंग थी। दोनों ही पति को अपने पास रखना चाहती थीं और दोनों ही अपने तरीके से “अधिकार” जताना चाहती थीं। ऐसे में जब झगड़ा बढ़ा तो परिवार का माहौल बिगड़ गया और मामला कानूनी स्तर तक पहुंच गया।
पंचायत का यह फैसला कैसे बना चर्चा का विषय?
पंचायत का यह फैसला न सिर्फ अनोखा है बल्कि इसमें समस्या का समाधान भी बुद्धिमानी से किया गया।कई लोग इसे मज़ाक की तरह देख रहे हैं, लेकिन इस फैसले में एक बात साफ है कि पंचायत ने दोनों पक्षों के अधिकारों को समान महत्व दिया और पति के मानसिक दबाव को भी समझा।
बिहार का ऐसा ही एक मामला भी चर्चा में रहा
इसी तरह का मामला पिछले साल बिहार के पूर्णिया से भी सामने आया था। वहां एक व्यक्ति ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी कर ली थी। विवाद बढ़ने पर पुलिस परिवार परामर्श केंद्र तक मामला गया। पहली पत्नी की शिकायत के बाद मामला और बिगड़ गया और अंततः एक हफ्ते के आधार पर पति का बंटवारा किया गया। उस बंटवारे में भी एक दिन पति की छुट्टी तय की गई थी, यानी पति को किसी भी पत्नी के साथ रहने की आज़ादी थी।
क्या यह समाधान सही है?
यह सवाल हर किसी के मन में उठता है। कुछ लोग इसे “मजेदार” और “अजीब” मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे समझदारी भरा, व्यावहारिक और तनाव-रहित समाधान बता रहे हैं। लेकिन एक बात तय है: यह फैसला गांव-देहात की पंचायतों की वास्तविकता और उनके समाधान ढूँढ़ने की क्षमता को दिखाता है।
यह मामला सिर्फ “दो पत्नियों के बीच पति के बंटवारे” का नहीं है, बल्कि यह समाज की उन परंपराओं और व्यावहारिकता का उदाहरण है, जहां पंचायतें खुद को “समाज के फैसले” का अंतिम माध्यम मानती हैं। पंचायत ने इस समस्या का हल किया तो बस इसलिए नहीं कि उसने “कानून” लागू किया, बल्कि इसलिए कि उसने लोगों की मानसिक स्थिति, तनाव और परिवार के बिगड़ते रिश्तों को समझा और उसी हिसाब से फैसला किया।