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27-Jan-2026 08:07 AM
By First Bihar
NEET UG exam : देश में ट्रेनों की लेट-लतीफी आम बात हो गई है, लेकिन कई बार यही देरी लोगों की जिंदगी पर गहरा असर डाल देती है। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से सामने आया है, जहां ट्रेन के विलंब के कारण एक छात्रा की नीट यूजी परीक्षा छूट गई। इस एक घटना ने न सिर्फ उसका एक पूरा साल बर्बाद कर दिया, बल्कि उसे मानसिक तनाव से भी गुजरना पड़ा। आखिरकार छात्रा ने रेलवे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया और अब वर्षों बाद उसे न्याय मिला है।
यह मामला बस्ती जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र के पिकौरा बक्स मोहल्ले की रहने वाली छात्रा समृद्धि से जुड़ा है। समृद्धि 7 मई 2018 को नीट यूजी की परीक्षा देने के लिए बस्ती से लखनऊ जा रही थीं। उन्होंने समय पर परीक्षा केंद्र पहुंचने के उद्देश्य से ट्रेन यात्रा का विकल्प चुना था, लेकिन दुर्भाग्यवश जिस ट्रेन से वे यात्रा कर रही थीं, वह काफी देर से चली। ट्रेन की देरी इतनी ज्यादा थी कि समृद्धि समय पर परीक्षा केंद्र नहीं पहुंच सकीं और उनका नीट यूजी का पेपर छूट गया।
नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में एक साल में सिर्फ एक ही मौका मिलता है। ऐसे में परीक्षा छूटने से समृद्धि का पूरा साल बर्बाद हो गया। इस घटना से आहत होकर उन्होंने हार मानने के बजाय रेलवे को जिम्मेदार ठहराने का फैसला किया। समृद्धि ने अपने वकील प्रभाकर मिश्रा के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग में रेलवे के खिलाफ मुकदमा दायर किया।
उनके वकील ने बताया कि मामले में रेलवे मंत्रालय, रेलवे के महाप्रबंधक और संबंधित स्टेशन अधीक्षक को नोटिस भेजा गया था। हालांकि, नोटिस का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद 11 सितंबर 2018 को विधिवत रूप से उपभोक्ता आयोग में मामला दर्ज किया गया। इसके बाद यह केस लंबे समय तक चला और करीब सात साल तक सुनवाई होती रही।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से यह स्वीकार किया गया कि ट्रेन वास्तव में देरी से चली थी, लेकिन ट्रेन के विलंब का कोई ठोस कारण रेलवे स्पष्ट नहीं कर सका। आयोग ने इसे सेवा में कमी (डिफिशिएंसी इन सर्विस) माना और छात्रा के आरोपों को सही ठहराया। आयोग ने कहा कि रेलवे जैसी बड़ी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह यात्रियों को समय पर और सुरक्षित सेवा प्रदान करे, खासकर तब जब यात्रियों की परीक्षा या करियर दांव पर लगा हो।
सभी पक्षों को सुनने के बाद जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को दोषी ठहराया और समृद्धि को मुआवजा देने का आदेश दिया। आयोग ने रेलवे को 9 लाख 10 हजार रुपये का हर्जाना 45 दिनों के भीतर अदा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि तय समय सीमा के भीतर यह राशि अदा नहीं की जाती है, तो पूरी रकम पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी रेलवे को देना होगा।
इस फैसले को न सिर्फ समृद्धि के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है, बल्कि यह उन लाखों यात्रियों के लिए भी एक मिसाल है, जो ट्रेन की देरी के कारण समय, पैसा और अवसर गंवाते हैं। यह मामला साबित करता है कि अगर कोई यात्री या छात्र अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए, तो उसे न्याय मिल सकता है। साथ ही यह फैसला रेलवे के लिए भी एक चेतावनी है कि यात्रियों की लापरवाही और देरी की कीमत अब भारी पड़ सकती है।
NEET UG exam : देश में ट्रेनों की लेट-लतीफी आम बात हो गई है, लेकिन कई बार यही देरी लोगों की जिंदगी पर गहरा असर डाल देती है। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से सामने आया है, जहां ट्रेन के विलंब के कारण एक छात्रा की नीट यूजी परीक्षा छूट गई। इस एक घटना ने न सिर्फ उसका एक पूरा साल बर्बाद कर दिया, बल्कि उसे मानसिक तनाव से भी गुजरना पड़ा। आखिरकार छात्रा ने रेलवे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया और अब वर्षों बाद उसे न्याय मिला है।
यह मामला बस्ती जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र के पिकौरा बक्स मोहल्ले की रहने वाली छात्रा समृद्धि से जुड़ा है। समृद्धि 7 मई 2018 को नीट यूजी की परीक्षा देने के लिए बस्ती से लखनऊ जा रही थीं। उन्होंने समय पर परीक्षा केंद्र पहुंचने के उद्देश्य से ट्रेन यात्रा का विकल्प चुना था, लेकिन दुर्भाग्यवश जिस ट्रेन से वे यात्रा कर रही थीं, वह काफी देर से चली। ट्रेन की देरी इतनी ज्यादा थी कि समृद्धि समय पर परीक्षा केंद्र नहीं पहुंच सकीं और उनका नीट यूजी का पेपर छूट गया।
नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में एक साल में सिर्फ एक ही मौका मिलता है। ऐसे में परीक्षा छूटने से समृद्धि का पूरा साल बर्बाद हो गया। इस घटना से आहत होकर उन्होंने हार मानने के बजाय रेलवे को जिम्मेदार ठहराने का फैसला किया। समृद्धि ने अपने वकील प्रभाकर मिश्रा के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग में रेलवे के खिलाफ मुकदमा दायर किया।
उनके वकील ने बताया कि मामले में रेलवे मंत्रालय, रेलवे के महाप्रबंधक और संबंधित स्टेशन अधीक्षक को नोटिस भेजा गया था। हालांकि, नोटिस का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद 11 सितंबर 2018 को विधिवत रूप से उपभोक्ता आयोग में मामला दर्ज किया गया। इसके बाद यह केस लंबे समय तक चला और करीब सात साल तक सुनवाई होती रही।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से यह स्वीकार किया गया कि ट्रेन वास्तव में देरी से चली थी, लेकिन ट्रेन के विलंब का कोई ठोस कारण रेलवे स्पष्ट नहीं कर सका। आयोग ने इसे सेवा में कमी (डिफिशिएंसी इन सर्विस) माना और छात्रा के आरोपों को सही ठहराया। आयोग ने कहा कि रेलवे जैसी बड़ी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह यात्रियों को समय पर और सुरक्षित सेवा प्रदान करे, खासकर तब जब यात्रियों की परीक्षा या करियर दांव पर लगा हो।
सभी पक्षों को सुनने के बाद जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को दोषी ठहराया और समृद्धि को मुआवजा देने का आदेश दिया। आयोग ने रेलवे को 9 लाख 10 हजार रुपये का हर्जाना 45 दिनों के भीतर अदा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि तय समय सीमा के भीतर यह राशि अदा नहीं की जाती है, तो पूरी रकम पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी रेलवे को देना होगा।
इस फैसले को न सिर्फ समृद्धि के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है, बल्कि यह उन लाखों यात्रियों के लिए भी एक मिसाल है, जो ट्रेन की देरी के कारण समय, पैसा और अवसर गंवाते हैं। यह मामला साबित करता है कि अगर कोई यात्री या छात्र अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए, तो उसे न्याय मिल सकता है। साथ ही यह फैसला रेलवे के लिए भी एक चेतावनी है कि यात्रियों की लापरवाही और देरी की कीमत अब भारी पड़ सकती है।