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09-Jan-2026 10:48 AM
By First Bihar
Land for Job case : दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने रेलवे में कथित जमीन के बदले नौकरी देने के बहुचर्चित घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शुक्रवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की चार्जशीट पर सुनवाई करते हुए अदालत ने लालू प्रसाद यादव, बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए मामले में कुल 52 आरोपियों को बरी भी कर दिया।
दरअसल, लैंड फॉर जॉब घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के परिवार को बड़ा कानूनी झटका लगा है। दिल्ली की राउस एवेन्यू कोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में लालू प्रसाद यादव सहित 40 से अधिक आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। जबकि दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) की चार्जशीट पर लालू, तेजस्वी यादव, राबड़ी देवी, तेज प्रताप, मीसा भारती, हेमा यादव समेत 40 लोगों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया है।
सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनने के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में प्रथम दृष्टया ऐसे पर्याप्त साक्ष्य और आधार मौजूद हैं, जिनके आधार पर आगे ट्रायल चलाया जा सकता है। अब अगली प्रक्रिया के तहत इस केस में विधिवत सुनवाई शुरू होगी और अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपियों के खिलाफ सबूत पेश किए जाएंगे।
सीबीआई के अनुसार, यह मामला उस अवधि से जुड़ा है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। जांच एजेंसी का आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों की नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं। आरोप है कि नौकरी के बदले अभ्यर्थियों या उनके परिजनों से जमीन ली गई, जिसे बाद में लालू यादव के परिवार के सदस्यों और उनके करीबी सहयोगियों के नाम पर ट्रांसफर कराया गया। सीबीआई का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों और कानूनों को ताक पर रखकर की गई और इसके पीछे एक संगठित साजिश काम कर रही थी।
जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि इस मामले में दाखिल की गई चार्जशीट में कुल 103 आरोपियों के नाम शामिल थे, जिनमें से अब तक पांच आरोपियों की मौत हो चुकी है। ऐसे में उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है, जबकि शेष आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ाया जाएगा। सीबीआई ने यह भी कहा कि उसके पास दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और लेन-देन से जुड़े कई अहम प्रमाण मौजूद हैं, जो यह दर्शाते हैं कि रेलवे की नौकरियों के बदले जमीन लेने का खेल सुनियोजित तरीके से खेला गया।
वहीं, लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। बचाव पक्ष का कहना है कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य विपक्षी नेताओं को बदनाम करना और राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। आरोपियों की ओर से अदालत में यह तर्क भी दिया गया कि जिन जमीन सौदों की बात की जा रही है, वे पूरी तरह से वैध थे और उनका रेलवे की नौकरियों से कोई लेना-देना नहीं था। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि नियुक्तियां तय प्रक्रियाओं के तहत हुई थीं और किसी भी तरह की अनियमितता साबित नहीं होती।
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को आरोप तय करने के स्तर पर स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस चरण पर यह देखना जरूरी नहीं है कि आरोप अंततः साबित होंगे या नहीं, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। अदालत के मुताबिक, सीबीआई द्वारा प्रस्तुत सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि मामले में गहन जांच और ट्रायल की आवश्यकता है।
इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। राजद ने इसे एक बार फिर केंद्र सरकार की एजेंसियों के दुरुपयोग का मामला बताया है, जबकि विपक्षी दल इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं। आने वाले समय में जब इस केस का ट्रायल शुरू होगा, तब गवाहों के बयान और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर यह तय होगा कि लैंड फॉर जॉब घोटाले में लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपी दोषी ठहराए जाते हैं या उन्हें राहत मिलती है। फिलहाल, कोर्ट के इस फैसले ने इस मामले को एक नए और अहम मोड़ पर ला खड़ा किया है।