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09-Dec-2025 09:27 AM
By First Bihar
Bihar minister : बिहार और केंद्र सरकार के कई नेताओं द्वारा वेतन और पेंशन दोनों लेने का मामला ताजा RTI जवाब में सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। 2 दिसंबर 2025 को प्राप्त RTI के अनुसार कुल आठ नेताओं के नाम सूचीबद्ध हैं, जिनमें मोदी सरकार और नीतीश सरकार दोनों के मंत्री शामिल हैं। यह खुलासा इसलिए गंभीर है क्योंकि नियमों के अनुसार किसी भी सदन का सदस्य रहते हुए पेंशन लेना पूरी तरह गैरकानूनी है।
बड़े नाम और पूरी लिस्ट
RTI में जिन नेताओं के नाम आए हैं, उनमें सबसे चौंकाने वाले नाम केंद्रीय मंत्री सतीश चंद्र दूबे और बिहार के वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव के हैं। इसके अलावा सूची में उपेंद्र कुशवाहा, देवेश चंद्र ठाकुर, ललन कुमार सर्राफ, नितीश मिश्रा और संजय सिंह भी शामिल हैं। सभी नेताओं को कई वर्षों से बिना रोक-टोक पेंशन मिलती रही है।
नीचे RTI में सामने आई पेंशन राशि और शुरुआत की तारीख दी गई है:
सतीश चंद्र दूबे: 59,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 26 मई 2019
बिजेंद्र प्रसाद यादव: 10,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 24 मई 2005
उपेंद्र कुशवाहा: 47,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 7 मार्च 2005
देवेश चंद्र ठाकुर: 86,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 7 मई 2020
ललन सर्राफ: 50,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 24 मई 2020
संजय सिंह: 68,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 7 मई 2018
नितीश मिश्रा: 43,000 रुपए, पेंशन शुरुआत 22 सितंबर 2015
भोला यादव: 65,000 रुपए, चुनाव हार चुके हैं, इसलिए नियम के अनुसार यह पेंशन वैध है
नेताओं का बैकग्राउंड
उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं और 2005 से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। वे NDA के सहयोगी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं। सतीश चंद्र दूबे वर्तमान में भारत सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं। उन्होंने पहले विधायक और लोकसभा सांसद के रूप में सेवा दी और 2019 में राज्यसभा पहुंचे।
बिजेंद्र प्रसाद यादव 1990 से लगातार सुपौल से विधायक हैं और वर्तमान में बिहार के वित्त एवं ऊर्जा मंत्री हैं। देवेश चंद्र ठाकुर जदयू नेता हैं और 2024 में लोकसभा सांसद बने। वे विधान परिषद के पूर्व सभापति भी रह चुके हैं। ललन सर्राफ जदयू के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य हैं। नितीश मिश्रा भाजपा विधायक हैं और उनका दावा है कि वे वर्तमान में पेंशन नहीं ले रहे। संजय सिंह जदयू के विधान पार्षद हैं और 2018 से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं।
नियम क्या कहते हैं और मामला विवादित क्यों है?
पेंशन और वेतन को लेकर नियम स्पष्ट हैं कि कोई भी सदस्य जो वेतन ले रहा है, वह पेंशन नहीं ले सकता। हर साल ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ जमा करना जरूरी है, जिससे साबित होता है कि पेंशन पाने वाला जीवित है और पात्र है। इसके अलावा, पेंशन जारी रखने के लिए यह लिखित में देना भी आवश्यक है कि वह व्यक्ति राज्य या केंद्र सरकार में किसी भी पद पर सेवा नहीं दे रहा है।
हालांकि, RTI में सामने आई लिस्ट के अनुसार कई मंत्री और सांसद पद पर रहते हुए पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह नियमों और प्रशासनिक प्रणाली दोनों का उल्लंघन है और इसे गंभीर प्रशासनिक कमी माना जा सकता है।
नेताओं की सफाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
देवेश चंद्र ठाकुर और नितीश मिश्रा ने कहा कि अगर उनके खाते में कोई पेंशन आई है तो वह वापस कर देंगे। ठाकुर ने साफ कहा कि उन्होंने कभी पेंशन की मांग नहीं की। नितीश मिश्रा ने दावा किया कि 2015 में मात्र एक माह की पेंशन ली गई थी, जब वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे, और उसके बाद पेंशन नहीं ली। राजनीतिक गलियारों में इस खुलासे के बाद विरोधी दलों ने सरकार पर पारदर्शिता और भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। मामला तब और गंभीर हो जाता है जब इसमें केंद्र और राज्य सरकार के मौजूदा मंत्री शामिल हैं। अब सवाल यह है कि सरकार इस पर क्या कार्रवाई करेगी और क्या पेंशन की गलत अदायगी रोकी जाएगी।
यह मामला न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन पर प्रश्न खड़ा करता है, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और वित्तीय अनुशासन पर भी सवाल उठाता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीति में गरमागरम बहस और संभावित जांच का कारण बन सकता है।