Bihar News: हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व सम्राट कैबिनेट में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा है कि आपातकाल सत्ता की बर्बरता, औपनिवेशिक मानसिकता और लोकतंत्र की सबसे बड़ी चेतावनी है. उन्होंने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख है, जिसे केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह वह दिन है जब सत्ता के अहंकार ने संविधान को चुनौती दी, नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचल दिया और लोकतंत्र की आत्मा को कैद करने का प्रयास किया। आपातकाल केवल 21 महीनों का शासन नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि जब सत्ता जवाबदेही से मुक्त हो जाती है, तब लोकतंत्र भी तानाशाही में बदल सकता है।
मंत्री संतोष सुमन ने आगे कहा कि, भारत ने अंग्रेजों से केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं प्राप्त की थी, बल्कि दमनकारी शासन, सेंसरशिप और "फूट डालो और राज करो" की नीति से भी मुक्ति पाई थी। अंग्रेज जानते थे कि भारत को कमजोर करने का सबसे आसान तरीका समाज को धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विभाजित करना है। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में भी कांग्रेस की राजनीति पर समय-समय पर यही आरोप लगता रहा कि उसने समाज को जोड़ने के बजाय विभाजन की राजनीति को चुनावी रणनीति बनाया। कभी हिंदू-मुस्लिम, कभी अगड़ा-पिछड़ा, कभी जाति और कभी क्षेत्र—वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रीय एकता को बार-बार चुनौती दी।
कांग्रेस का गठन ब्रिटिश शासनकाल में हुआ। इतिहासकार इस बात पर अलग-अलग मत रखते हैं कि उसकी स्थापना के पीछे ब्रिटिश प्रशासन की क्या भूमिका थी, लेकिन यह निर्विवाद है कि स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस के भीतर सत्ता-केंद्रित राजनीति मजबूत होती गई। 1975 का आपातकाल उसी मानसिकता की चरम अभिव्यक्ति था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त किए जाने के बाद लोकतंत्र की अपेक्षा थी कि नैतिकता का पालन होगा। किंतु इसके विपरीत पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया गया। संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे जेलों में डाल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। अखबारों की सुर्खियाँ सरकार तय करने लगीं। न्यायपालिका पर दबाव बनाया गया और प्रशासन को सत्ता का औजार बना दिया गया।
लोकतंत्र के इस अंधकारमय दौर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण आशा की सबसे बड़ी किरण बनकर उभरे। उन्होंने सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया—ऐसी क्रांति, जिसमें राजनीति, समाज और व्यवस्था सभी में नैतिक परिवर्तन हो। बिहार की धरती से उठी उनकी आवाज़ पूरे देश में लोकतंत्र की पुकार बन गई। लेकिन सत्ता ने इस आवाज़ का उत्तर संवाद से नहीं, बल्कि दमन, गिरफ्तारी और उत्पीड़न से दिया।
यही वह समय था जब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की अमर पंक्तियाँ जन-जन की आवाज़ बन गईं—"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"यह केवल कविता नहीं थी, बल्कि लोकतंत्र का उद्घोष था कि सत्ता जनता की सेवक है, स्वामी नहीं। अंततः वही जनता लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का कारण बनी।
आपातकाल की सबसे अमानवीय घटनाओं में जबरन नसबंदी अभियान भी शामिल था। सरकारी लक्ष्य पूरे करने की होड़ में गरीबों, मजदूरों और ग्रामीणों को पकड़-पकड़कर नसबंदी कराई गई। कई स्थानों पर सरकारी योजनाओं, राशन, नौकरी और लाइसेंस तक को नसबंदी से जोड़ दिया गया। हजारों परिवार भय, अपमान और उत्पीड़न का शिकार हुए। इसी काल में दिल्ली सहित कई शहरों में गरीब बस्तियों पर बुलडोजर चलाए गए और हजारों लोग बेघर हो गए। यह सब उस भारत में हुआ जिसने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया था।
विडंबना यह भी रही कि जिन दलितों, पिछड़ों और वंचितों के नाम पर कांग्रेस दशकों तक राजनीति करती रही, उन्हें वास्तविक सामाजिक सशक्तीकरण और सम्मान देने के प्रश्न पर उसका रिकॉर्ड हमेशा बहस का विषय रहा। डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ उसके वैचारिक मतभेद इतिहास का हिस्सा हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति अधिक हुई, लेकिन समाज को स्थायी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम नहीं दिखे।
आज भी जब समाज को धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित करने की राजनीति सामने आती है, तब आपातकाल का स्मरण केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हो जाता है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की धाराएँ नहीं करतीं, बल्कि जागरूक नागरिक, स्वतंत्र प्रेस, निष्पक्ष न्यायपालिका और सत्ता से सवाल पूछने का साहस उसे जीवित रखता है।
आपातकाल हमें यह सिखाता है कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, जनता उससे बड़ी होती है। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान करना, संविधान की मर्यादा बनाए रखना और समाज को जोड़कर आगे बढ़ाना है। इतिहास उन लोगों को कभी क्षमा नहीं करता जो सत्ता के लिए लोकतंत्र का गला घोंटते हैं, और न ही उन नागरिकों को भूलता है जो उसके पुनर्जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। इसलिए 25 जून केवल इतिहास की एक तारीख नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी बने रहने की शपथ का दिवस है—ताकि भारत में फिर कभी आपातकाल जैसी त्रासदी दोहराई न जा सके।





