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International Women's Day: बिहार में इस समाज से आने वाली महिलाओं ने किया कमाल, पिंक बस चलाकर बनी मिशाल

International Women's Day: कभी बस चलाने की बात पर ताने सुनने वाली अनीता कुमारी और गायत्री कुमारी आज पटना में पिंक बस चला रही हैं। मुसहर समाज से आने वाली इन महिलाओं ने कठिन हालात के बावजूद अपनी मेहनत से नई पहचान बनाई है।

International Women's Day: बिहार में इस समाज से आने वाली महिलाओं ने किया कमाल, पिंक बस चलाकर बनी मिशाल
Tejpratap
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5 मिनट

International Women's Day: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर बिहार के पटना जिले के पुनपुन क्षेत्र की दो महिलाओं अनीता कुमारी और गायत्री कुमारी की कहानी समाज के लिए प्रेरणा बनकर सामने आई है। मुसहर समाज से आने वाली इन दोनों महिलाओं ने कठिन परिस्थितियों और सामाजिक तानों के बावजूद अपने हौसले के दम पर एक नई पहचान बनाई है। आज वे बिहार सरकार की पिंक बस सेवा की ड्राइवर हैं और पटना की सड़कों पर बस चलाकर न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर बनी रूढ़ियों को भी तोड़ रही हैं।


कभी जिन महिलाओं को बस चलाने की बात पर लोगों के ताने सुनने पड़ते थे, आज वही महिलाएं आत्मविश्वास के साथ भारी-भरकम बस का स्टीयरिंग संभाल रही हैं। उनकी सफलता से न केवल उनका परिवार बल्कि पूरा गांव गर्व महसूस कर रहा है।


तानों और संदेह के बीच तय किया सफर

अनीता और गायत्री का पिंक बस ड्राइवर बनने का सफर आसान नहीं रहा। जब उन्होंने बस चलाने का फैसला किया तो समाज और रिश्तेदारों ने उनकी क्षमता पर सवाल उठाए। लोगों ने उनकी कद-काठी और शारीरिक ताकत को लेकर मजाक उड़ाया। कई लोगों ने कहा कि उनकी हाइट कम है, वे ब्रेक पैडल तक कैसे पहुंचेंगी और भारी बस का गियर कैसे बदल पाएंगी।


कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि अगर वे बस लेकर सड़क पर निकलेंगी तो हादसे कर देंगी। लेकिन इन दोनों महिलाओं ने इन तानों और आलोचनाओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मेहनत के दम पर यह साबित कर दिया कि अगर मन में दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।


सुधा वर्गीस बनीं सहारा और मार्गदर्शक

अनीता और गायत्री जैसी महिलाओं को आगे बढ़ाने में सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री सुधा वर्गीस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने इन महिलाओं को न केवल प्रेरित किया बल्कि उन्हें प्रशिक्षण दिलाने के लिए औरंगाबाद भी भेजा।


सुधा वर्गीस ने इन महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दिलाने के साथ-साथ लाइसेंस बनवाने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भी मदद की। उनके मार्गदर्शन और सहयोग की बदौलत आज कई महिलाएं पटना में पिंक बस चला रही हैं। इनमें से कुछ महिलाओं ने 26 जनवरी के अवसर पर गांधी मैदान में आयोजित झांकी के दौरान मंत्रियों को बस में बैठाकर अपनी ड्राइविंग का प्रदर्शन भी किया था, जिससे लोगों का नजरिया बदलने लगा।


कम उम्र में शादी, फिर भी नहीं छोड़ा सपना

23 वर्षीय अनीता कुमारी की कहानी भी काफी प्रेरणादायक है। अनीता बताती हैं कि उनके समाज में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है। उनकी शादी भी 18 साल की उम्र में हो गई थी। हालांकि शादी के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा।


अनीता के पास पहले से ड्राइविंग लाइसेंस था और उन्हें गाड़ी चलाना आता था। जब पिंक बस ड्राइवर के लिए भर्ती निकली तो उनके पति ने उन्हें आवेदन करने के लिए प्रेरित किया। अनीता बताती हैं कि उनके पति और ससुराल वालों ने हर कदम पर उनका साथ दिया। परिवार के समर्थन और अपने आत्मविश्वास की बदौलत ही वह आज एक बस ड्राइवर के रूप में काम कर रही हैं और आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।


मजदूर पिता की बेटी ने किया सपना पूरा

गायत्री कुमारी का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। उनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और रोज करीब 400 रुपये कमाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। सात लोगों के परिवार में इतने कम पैसे में घर चलाना आसान नहीं था।


गायत्री बताती हैं कि आर्थिक तंगी के बावजूद उनके परिवार ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज जब वह बस चलाने के लिए घर से निकलती हैं तो उनके पिता को उन पर गर्व होता है। उन्हें खुशी है कि उनकी बेटी ने वह कर दिखाया जो वे खुद नहीं कर पाए।


दूसरी महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा

आज जब अनीता और गायत्री बस लेकर सड़क पर निकलती हैं तो राहगीर और दूसरे ड्राइवर उन्हें हैरानी से देखते हैं। लेकिन इन दोनों महिलाओं का आत्मविश्वास और संकल्प अडिग है।

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