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Bihar Assembly Election 2025 : सीमांचल पर चुनावी फोकस: NDA का मास्टरस्ट्रोक या तेजस्वी का वादा , किस पर जनता को भरोसा ; जानिए क्या रहा है अबतक का समीकरण

Bihar Assembly Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सीमांचल इलाका राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र बन गया है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र की 24 विधानसभा सीटों पर सबकी नज़र है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास की सौगातों और चुनावी संदेशों के

Bihar Assembly Election 2025
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Tejpratap
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Bihar Assembly Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने ही वाला है और इससे पहले राज्य का सीमांचल इलाका राजनीतिक सरगर्मियों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। हर राजनीतिक दल सीमांचल को साधने में जुटा हुआ है, क्योंकि यह इलाका सत्ता की कुंजी रखने वाला क्षेत्र माना जाता है। मुस्लिम बहुल इस इलाके में कुल 24 विधानसभा सीटें आती हैं और यहां का रुख़ अक्सर पूरे बिहार के चुनावी समीकरण को प्रभावित करता है।


सीमांचल इलाका न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति बल्कि सामाजिक और धार्मिक समीकरणों की वजह से भी राजनीतिक रूप से अहम है। यह क्षेत्र असम और पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है, जहां मुस्लिम आबादी और पिछड़े वर्गों की बड़ी हिस्सेदारी है। यही वजह है कि यहां का मतदाता रुख़ बदलते ही पूरे चुनावी नतीजों की दिशा तय कर देता है।


2020 के चुनाव की बात करें तो सीमांचल की 24 सीटों में से बीजेपी ने 8 सीटें, जेडीयू ने 4, कांग्रेस ने 5, आरजेडी और माले ने 1-1 सीट जीती थीं, जबकि AIMIM को 5 सीटें मिली थीं। यह आंकड़े बताते हैं कि यह क्षेत्र हर बार नए राजनीतिक प्रयोग और समीकरण का गवाह रहा है। 2015 में आरजेडी यहां 9 सीटें जीतकर सबसे बड़ी ताकत बनी थी।


सीमांचल की अहमियत को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस इलाके पर फोकस किया है। चुनावी तपिश के बीच उनका यह सातवां बिहार दौरा है। प्रधानमंत्री ने अपने दौरे के दौरान विकास की कई सौगातें दी हैं, जिनमें एयरपोर्ट और मखाना बोर्ड की शुरुआत को विशेष रूप से देखा जा रहा है। इससे पहले अगस्त में उन्होंने गंगा नदी पर औंटा-सिमरिया पुल का उद्घाटन कर उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाली सड़क परियोजना को जनता को समर्पित किया था।


मोदी का यह रुख़ केवल विकास परियोजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ज़रिये वह सीमांचल में एनडीए की छवि को मजबूत करने की रणनीति भी अपना रहे हैं। जानकारों का मानना है कि पीएम मोदी का हर भाषण केवल वादों का एलान नहीं होता, बल्कि उसमें उनकी पूरी चुनावी रणनीति छिपी होती है।


सीमांचल को लेकर इस बार की लड़ाई और भी दिलचस्प हो गई है। 2020 में AIMIM के प्रदर्शन ने बीजेपी को अप्रत्याशित रूप से फायदा पहुंचाया था। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने यहां की 5 सीटें जीतकर विपक्षी वोट बैंक में सेंध लगा दी थी। इस वजह से बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।


लेकिन इस बार हालात अलग हैं। INDIA ब्लॉक (आरजेडी, कांग्रेस, लेफ्ट और अन्य दलों का गठबंधन) ने सीमांचल पर फोकस करके यहां की रणनीति बदल दी है। अगर विपक्षी वोट बैंक एकजुट हुआ तो यह बीजेपी और जेडीयू के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री खुद सीमांचल की सियासत को साधने के लिए मैदान में उतर गए हैं।


एनडीए की तरफ से सीमांचल में बीजेपी और जेडीयू दोनों सक्रिय हैं। जेडीयू का पारंपरिक जनाधार यहां पहले से है, लेकिन 2020 में इसका असर कम हुआ। वहीं बीजेपी ने यहां अप्रत्याशित बढ़त बनाई थी। अब दोनों दल मिलकर सीमांचल में विपक्ष की चुनौती का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी का विकास एजेंडा, नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और जेडीयू के स्थानीय संगठनात्मक ढांचे का मिलाजुला असर सीमांचल में एनडीए को बढ़त दिला सकता है।


सीमांचल के चुनावी समीकरण

सीमांचल की 24 सीटों पर 2020 और 2015 के चुनाव नतीजे बताते हैं कि यहां कोई भी दल लगातार अपना दबदबा नहीं बनाए रख पाया है।

2020 नतीजे: बीजेपी – 8, जेडीयू – 4, कांग्रेस – 5, AIMIM – 5, आरजेडी – 1, माले – 1

2015 नतीजे: आरजेडी – 9, जेडीयू – 5, कांग्रेस – 5, बीजेपी – 5


इन आंकड़ों से साफ है कि सीमांचल के मतदाता हर बार नए समीकरण बनाते हैं और किसी एक दल के साथ स्थायी तौर पर नहीं रहते। यही वजह है कि इस इलाके में सभी दल पूरे दमखम के साथ जुटे हुए हैं। चुनाव से पहले सीमांचल में विकास का मुद्दा बड़ा हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी एयरपोर्ट, पुल, मखाना बोर्ड और अन्य योजनाओं के ज़रिये यहां के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं विपक्षी दल सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बना रहे हैं।


कांग्रेस और आरजेडी सीमांचल में अपने पुराने जनाधार को वापस पाने की कोशिश में हैं, जबकि AIMIM अपने मुस्लिम वोट बैंक पर फोकस कर रही है। लेफ्ट पार्टियां भी पिछड़े वर्गों और किसानों के मुद्दों को उठाकर यहां अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीमांचल दौरा और विकास की सौगातें बीजेपी-जेडीयू को फायदा दिला पाएंगी? विपक्ष की रणनीति और वोट बैंक समीकरण किस दिशा में जाएंगे, यह अभी कहना मुश्किल है। हालांकि, इतना तय है कि सीमांचल इस बार भी बिहार की सत्ता के रास्ते की सबसे अहम कड़ी होगा। यहां का परिणाम यह तय करेगा कि सत्ता की चाबी किस दल के हाथ में जाएगी।