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दहेज हत्या पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- अगर अपमान करना है तो शादी ही क्यों करते हो?

दहेज प्रताड़ना के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि दुल्हन और उसके परिवार का अपमान किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कड़ा संदेश देने की बात कही।

बिहार न्यूज
सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
4 मिनट

DELHI: दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि यदि लड़के और उनके परिवार को दुल्हन और उसके परिवार का अपमान ही करना है तो वे शादी क्यों करते हैं? अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि दुल्हन और उसके परिवार के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ के एक दहेज उत्पीड़न मामले की सुनवाई के दौरान आई। मामले में एक महिला ने शादी के तीन वर्ष के भीतर अपने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मृतका के परिजनों का आरोप था कि पति और ससुराल पक्ष के लोग लगातार नकदी और कार की मांग कर रहे थे तथा उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। दरअसल, देश में दहेज के कारण होने वाली मौतों की लंबी सूची है। ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर और निकिता भाटी जैसे कई मामलों में मौत के तरीके भले अलग-अलग रहे हों, लेकिन आरोप एक ही रहा है,दहेज के लिए प्रताड़ना।


मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने ससुराल पक्ष के व्यवहार की कड़ी आलोचना की और दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यह मामला वर्ष 2010 का है, जिसमें महिला ने विवाह के तीन साल के भीतर आत्महत्या कर ली थी। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसे दहेज हत्या का मामला माना था। अदालत ने कहा था कि मृतका को लगातार पैसों के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था और उसकी मौत से पहले भी दहेज की मांग जारी थी। हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी लगने से दम घुटना बताया गया था, लेकिन अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को देखते हुए दहेज उत्पीड़न और मौत के बीच सीधा संबंध माना।


इसके बाद पति और उसके परिवार के कई सदस्यों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी (दहेज हत्या), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498ए (क्रूरता एवं उत्पीड़न) समेत अन्य धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। बाद में महिला के पति के छोटे भाई ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और राहत की मांग की। हालांकि शीर्ष अदालत ने उसकी दलीलों को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "आपको खुश होना चाहिए कि आपको केवल धारा 498ए के तहत तीन साल की सजा मिली है।"


उन्होंने कहा कि दहेज के नाम पर दुल्हन और उसके परिवार को आर्थिक रूप से निचोड़ने की कोशिश की जाती है। रिकॉर्ड में दर्ज आरोपों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "लड़की के परिवार को भिखारी कहा गया। जब पिता अपनी बेटी को बचाने की गुहार लगा रहे थे और 60 हजार रुपये देने की बात कह रहे थे, तब भी उनका अपमान किया गया।" याचिकाकर्ता के वकील ने एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में समाज को एक स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि दुल्हनों और उनके परिवारों के साथ होने वाला अपमान और उत्पीड़न अब किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।