ब्रेकिंग
UPI पेमेंट पर MDR चार्ज फिलहाल टला, दिवाली के बाद होगा नए नियमों पर फैसला; यूजर्स को बड़ी राहत✦निगरानी की गिरफ्त में आया भ्रष्ट पंचायत रोजगार सेवक, 30 हजार रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार✦सात समंदर पार परवान चढ़ा प्यार... रूस की जूली ने थामा भागलपुर के राहुल का हाथ, अब बिहार में बजेगी शहनाई✦बिहार में गांजा तस्करी का खेल, लग्जरी कार में बने तहखाने से बड़ी खेप जब्त, सरगना समेत 3 गिरफ्तार✦पटना में SIR के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन: जेपी गोलंबर पर बैरिकेडिंग तोड़ आगे बढ़े छात्र, पुलिस वैन की चाबी लेकर भागे✦UPI पेमेंट पर MDR चार्ज फिलहाल टला, दिवाली के बाद होगा नए नियमों पर फैसला; यूजर्स को बड़ी राहत✦निगरानी की गिरफ्त में आया भ्रष्ट पंचायत रोजगार सेवक, 30 हजार रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार✦सात समंदर पार परवान चढ़ा प्यार... रूस की जूली ने थामा भागलपुर के राहुल का हाथ, अब बिहार में बजेगी शहनाई✦बिहार में गांजा तस्करी का खेल, लग्जरी कार में बने तहखाने से बड़ी खेप जब्त, सरगना समेत 3 गिरफ्तार✦पटना में SIR के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन: जेपी गोलंबर पर बैरिकेडिंग तोड़ आगे बढ़े छात्र, पुलिस वैन की चाबी लेकर भागे

‘बाल्टी में पेशाब कर मुझ पर फेंका… शरीर पर जख्म ही जख्म’, फिर भी नहीं टूटी हिम्मत—नरक जैसी जिंदगी से निकलकर कमिश्नर बनीं सविता

Savita Pradhan Success Story: सविता प्रधान की कहानी संघर्ष, दर्द और हिम्मत का ऐसा उदाहरण है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देता है। एक समय था जब उनकी जिंदगी मुश्किलों से घिरी थी, लेकिन आज वही सविता एक बड़े पद पर पहुंच चुकी हैं—आखिर कैसे बदली उनकी..

‘बाल्टी में पेशाब कर मुझ पर फेंका… शरीर पर जख्म ही जख्म’, फिर भी नहीं टूटी हिम्मत—नरक जैसी जिंदगी से निकलकर कमिश्नर बनीं सविता
Ramakant kumar
4 मिनट

Savita Pradhan Success Story: कभी हालात ऐसे थे कि हर दिन जुल्म, अपमान और दर्द उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था। लेकिन उसी दर्द को ताकत बनाकर सविता प्रधान ने वो कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी मुश्किल लगती है। आज वे एक नगर निगम कमिश्नर हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बेहद दर्दनाक और संघर्षों से भरा रहा है।


अभावों में पला बचपन, सपनों से भरी आंखें

मध्य प्रदेश के सिंगरौली इलाके के एक छोटे से गांव में जन्मीं सविता का बचपन गरीबी और अभावों के बीच बीता। परिवार आदिवासी था और रोजमर्रा की जिंदगी मेहनत पर टिकी थी। खेतों में काम करना, महुआ बीनना, घर के काम संभालना, ये सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।


गांव में लड़कियों की पढ़ाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन सविता के माता-पिता ने उन्हें स्कूल भेजा। यही फैसला उनकी जिंदगी की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।


2 रुपये के लिए 7 किलोमीटर पैदल

पढ़ाई के लिए उनका संघर्ष किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। स्कूल करीब 7 किलोमीटर दूर था और बस का किराया 2 रुपये। कई बार जेब में ये पैसे भी नहीं होते थे। लेकिन सविता ने हार नहीं मानी। वे पैदल चलकर स्कूल जाती रहीं। धूप हो या बारिश, हर दिन उन्होंने अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाए।


वह अपने गांव की पहली लड़की बनीं, जिन्होंने 10वीं पास की। इसके बाद उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना देखा और बायोलॉजी से पढ़ाई शुरू की।


कम उम्र में शादी और टूटा हर सपना

लेकिन जिंदगी ने अचानक करवट ली। महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। बड़े घर और बेहतर जिंदगी के सपने दिखाए गए, लेकिन ससुराल पहुंचते ही सब कुछ बदल गया। पढ़ाई का वादा झूठा निकला और उनकी जिंदगी घरेलू हिंसा के अंधेरे में डूब गई।


हर दिन जुल्म, हर दिन अपमान

शादी के बाद सविता की जिंदगी में दर्द का सिलसिला शुरू हो गया। मारपीट, गालियां, अपमान—सब कुछ आम हो गया। उन्हें ठीक से खाना भी नहीं मिलता था। कई बार वे छुपकर रोटी खाती थीं। उनके शरीर पर चोट और जलने के निशान बढ़ते गए।


एक समय ऐसा भी आया जब उनके साथ इंसानियत को शर्मसार करने वाला व्यवहार किया गया, लेकिन फिर भी उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया।


जब जिंदगी खत्म करने का फैसला किया

लगातार अत्याचार झेलते-झेलते एक दिन उन्होंने सब कुछ खत्म करने का मन बना लिया। उन्होंने अपने बच्चों को सुलाया और आखिरी बार उन्हें देखा। लेकिन उसी पल उन्होंने खुद से सवाल किया—क्या यह अंत सही है? यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।


खुद के दम पर नई शुरुआत

सविता ने ससुराल छोड़ने का फैसला किया। बिना किसी सहारे के उन्होंने नई जिंदगी शुरू की। उन्होंने छोटे-छोटे काम किए—पार्लर में काम, ट्यूशन पढ़ाना और साथ ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। बच्चों की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


पहली कोशिश में बनीं अफसर

सविता का लक्ष्य अब साफ था—एक सम्मानजनक जिंदगी। उन्होंने पूरी मेहनत से पढ़ाई की और मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा दी। पहले ही प्रयास में उन्होंने सफलता हासिल कर ली। यह उनके संघर्ष की सबसे बड़ी जीत थी।


अब दूसरों के लिए प्रेरणा

आज सविता प्रधान सिंगरौली नगर निगम में कमिश्नर हैं। वह अपने पद का इस्तेमाल समाज की उन महिलाओं और लड़कियों की मदद के लिए कर रही हैं, जो कभी उसी दर्द से गुजरती हैं, जिससे वह खुद गुजरी थीं।