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Success Story: पिता के निधन के बाद भी नहीं टूटा हौसला, दिव्या तंवर पहले बनीं IPS, फिर बन गईं IAS अधिकारी; जानिए सफलता की कहानी

Success Story: हरियाणा के छोटे से गांव निंबी की रहने वाली दिव्या तंवर ने साबित किया है कि मेहनत, धैर्य और पक्के इरादों से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। उनकी सफलता की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है।

Success Story
सफलता की कहानी
© GOOGLE
PRIYA DWIVEDI
3 मिनट

Success Story: हरियाणा के छोटे से गांव निंबी की रहने वाली दिव्या तंवर ने साबित किया है कि मेहनत, धैर्य और पक्के इरादों से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। उनकी सफलता की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। दिव्या ने न केवल सरकारी स्कूलों और नवोदय विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की, बल्कि दो बार UPSC सिविल सेवा परीक्षा क्रैक करके यह साबित किया कि परिस्थितियां कभी लक्ष्य तक पहुँचने में बाधा नहीं बन सकतीं।


साल 2011 में दिव्या तंवर के पिता का निधन हो गया। यह ऐसा समय था जब अक्सर पढ़ाई बाधित हो जाती है, लेकिन उनकी मां बबीता तंवर ने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने दिन में खेतिहर मजदूर के रूप में और रात में दर्जी के रूप में काम किया, ताकि अपने चार बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित कर सकें। उनकी मेहनत और समर्पण ने दिव्या को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।


दिव्या ने सरकारी स्कूलों से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में नवोदय विद्यालय में पढ़ाई जारी रखी। इसके बाद उन्होंने सरकारी वीमेंस कॉलेज, महेन्द्रगढ़ से B.Sc की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाई। इसी दौरान उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा देने का फैसला किया।


महंगी कोचिंग की बजाय दिव्या ने फ्री ऑनलाइन स्टडी मटेरियल और मॉक टेस्ट पर भरोसा किया। उन्होंने रोजाना 10 घंटे पढ़ाई की और लगातार मेहनत जारी रखी। उनके संघर्ष और समर्पण का परिणाम रहा कि उन्होंने बहुत कम उम्र में ही दो बार UPSC परीक्षा क्रैक की। साल 2021 में पहला अटेम्प्ट देने पर उन्होंने 438वीं रैंक हासिल की और IPS अधिकारी बनीं। इसके बावजूद उनका सपना IAS बनना था। उन्होंने फिर से तैयारी की और 2022 में 105वीं रैंक हासिल करके IAS अधिकारी बनीं। वर्तमान में दिव्या मणिपुर कैडर में कार्यरत हैं।


दिव्या की कहानी केवल एक परीक्षा की सफलता नहीं है, बल्कि संघर्ष, समर्पण और परिवार के त्याग की मिसाल है। उनकी मां बबीता तंवर का संघर्ष, उनके पिता की कमी, सीमित संसाधन और खुद की मेहनत ने मिलकर दिव्या को युवा पीढ़ी के लिए प्रेरक शक्ति बना दिया। उनके अनुभव यह दिखाते हैं कि सही मार्गदर्शन, धैर्य और आत्मविश्वास से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। दिव्या तंवर आज न केवल युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि गरीबी और कठिनाइयों के बावजूद सपने साकार किए जा सकते हैं, बशर्ते आपके पास दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत हो।