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100 रुपये की घूस… 49 साल तक चलता रहा केस, आखिर में ऐसा हुआ फैसला कि सब रह गए हैरान

Bihar News: बिहार का यह मामला सुनने में इतना चौंकाने वाला है कि लगेगा जैसे कहानी फिल्म की हो। एक गलत बिजली बिल और सिर्फ 100 रुपये की रिश्वत के आरोप ने 49 साल तक अदालत का रास्ता देखा, और आखिरकार रिकॉर्ड की खराब हालत के कारण केस बरी कर दिया गया।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 30, 2026, 2:13:16 PM

100 रुपये की घूस… 49 साल तक चलता रहा केस, आखिर में ऐसा हुआ फैसला कि सब रह गए हैरान

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Bihar News: बिहार में "एक ऐसे केस का निपटारा किया गया है, जिसकी कहानी के बारे में हम बतावेंगे न, तो आप भी कहिएगा कि झूठ बोल रहा है।“ दरअसल, एक व्यक्ति से गलत बिजली बिल सुधारने के लिए मात्र 100 रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। पीड़ित ने हिम्मत दिखाते हुए इसका केस दर्ज कराया। ये मुकदमा इतना लंबा चला कि इसके निपटारे में 49 साल लग गए। बरी होने का कारण भी आश्चर्यजनक था — कोर्ट में रखे गए रिकॉर्ड इतने खराब हालत में थे कि उन्हें पढ़ना तक मुश्किल हो गया था।


जब एक बिल ने खड़ी कर दी बड़ी परेशानी

यह पूरा मामला 24 अगस्त 1977 का है। हाजीपुर में रहने वाले धर्मनाथ राय को अचानक एक ऐसा बिजली बिल मिला, जिसने उनके होश उड़ा दिए। बिल की रकम थी 55,432 रुपये। उस समय के हिसाब से यह रकम बेहद ज्यादा थी और लगभग असंभव लग रही थी।


धर्मनाथ राय समझ गए कि कहीं न कहीं गड़बड़ी जरूर हुई है। वह सीधे बिजली विभाग पहुंचे और अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने आवेदन भी दिया कि इस बिल को ठीक किया जाए, क्योंकि यह पूरी तरह से गलत है।


100 रुपये की मांग और बढ़ता विवाद

धर्मनाथ राय का आरोप था कि जब उन्होंने बिल ठीक कराने की बात कही, तो वहां मौजूद कर्मचारियों ने उनसे 100 रुपये की रिश्वत मांगी। यह रकम भले ही छोटी लगे, लेकिन उस समय के हिसाब से यह भी कम नहीं थी। आरोप के मुताबिक, बिजली विभाग के पांच कर्मचारियों, जगरनाथ मिश्र, देवनाथ तिवारी, राजमंगल सिंह, विभूतिशरण सिंह और किशुन सिंह ने मिलकर उनसे यह रकम मांगी। कहा गया कि अगर पैसे नहीं दिए, तो बिल में सुधार नहीं होगा।


धर्मनाथ राय ने रिश्वत देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद उनका आरोप है कि उनका बिजली कनेक्शन भी काट दिया गया, जिससे मामला और गंभीर हो गया।


थाने से कोर्ट तक पहुंचा मामला

इसके बाद धर्मनाथ राय सीधे हाजीपुर टाउन थाना पहुंचे और पांचों कर्मचारियों के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और शुरुआती जांच में रिश्वत मांगने के सबूत भी मिले। जल्द ही सभी आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी गई। मामला अदालत में पहुंचा और सुनवाई शुरू हुई। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह केस इतना लंबा चलेगा।


49 साल में बदल गई पूरी तस्वीर

समय बीतता गया, लेकिन केस चलता रहा। इस दौरान हालात इतने बदल गए कि पांच में से चार आरोपी—जगरनाथ मिश्र, देवनाथ तिवारी, राजमंगल सिंह और विभूतिशरण सिंह—की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई। आखिर में सिर्फ एक आरोपी किशुन सिंह ही बचे, जो रिटायर हो चुके थे। लेकिन केस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। हर तारीख के साथ यह मामला और पुराना होता गया।


जब रिकॉर्ड ही जवाब दे गए

इस केस का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब अदालत में रिकॉर्ड पेश करने की बात आई। 49 साल पुराने दस्तावेज इतने खराब हो चुके थे कि उन्हें पढ़ना तक मुश्किल हो गया था। कई कागज फट चुके थे और कई की हालत इतनी खराब थी कि उनमें क्या लिखा है, यह समझना भी आसान नहीं था।


इतना ही नहीं, पुलिस भी इस मामले की पूरी केस डायरी अदालत में पेश नहीं कर सकी। ऐसे में अदालत के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बिना पुख्ता रिकॉर्ड के फैसला कैसे सुनाया जाए।


अंत में क्या हुआ फैसला

आखिरकार, अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखते हुए फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब केस से जुड़े जरूरी दस्तावेज ही ठीक हालत में नहीं हैं और पुलिस डायरी भी उपलब्ध नहीं है, तो आरोप साबित करना संभव नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने बचे हुए आरोपी किशुन सिंह को बरी कर दिया और 49 साल पुराने इस केस का अंत हो गया।