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Bihar Politics : रिजर्वेशन पर आमने-सामने दो बड़े दलित नेता! चिराग के बयान के बाद संतोष मांझी की हुंकार—आरक्षण की समीक्षा का अर्थ खत्म करना नहीं

आरक्षण को लेकर चिराग पासवान और संतोष कुमार सुमन आमने-सामने दिख रहे हैं। चिराग ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए बचाने की बात कही, वहीं संतोष सुमन ने कहा कि समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि लाभ सबसे वंचित तक पहुंचाना है।

Bihar Politics : रिजर्वेशन पर आमने-सामने दो बड़े दलित नेता! चिराग के बयान के बाद संतोष मांझी की हुंकार—आरक्षण की समीक्षा का अर्थ खत्म करना नहीं
Tejpratap
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6 मिनट

Bihar Politics : देश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर चल रहे ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शन तक, आरक्षण को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच दलित राजनीति के दो प्रमुख चेहरों—केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और बिहार सरकार के मंत्री एवं हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन—के बयानों ने इस बहस को और धार दे दी है।

मामला तब गरमाया जब चिराग पासवान का आरक्षण को लेकर दिया गया बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। चिराग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है। उन्होंने कहा कि जब तक चिराग पासवान जिंदा हैं, तब तक न संविधान को खतरा है और न ही आरक्षण को।

चिराग पासवान ने आरक्षण की जरूरत को समझाने के लिए देश में आज भी मौजूद सामाजिक भेदभाव का हवाला दिया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़ी उत्तराखंड की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि आज भी दलितों के साथ भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दलित समाज के लोगों को घोड़े पर चढ़ने, शादी का जुलूस निकालने या मंदिरों में समान अधिकार पाने तक में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे माहौल में आरक्षण की जरूरत कैसे खत्म हो सकती है।

चिराग का यह रुख सामने आने के बाद अब बिहार के एक और बड़े दलित नेता डॉ. संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण को लेकर अपनी अलग लेकिन महत्वपूर्ण बात रखी है। सुमन ने कहा कि आरक्षण की समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है, बल्कि उसका लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचाना है।

उन्होंने कहा कि उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पहले भी समर्थन किया था और आज भी उस पर कायम हैं। उनके मुताबिक, आजादी के 79 साल बाद यह सवाल पूछना गलत नहीं है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों को कितना मिला और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े कौन से लोग अभी भी इससे वंचित हैं।

संतोष सुमन ने अपनी बात को सामाजिक न्याय के व्यापक नजरिए से जोड़ते हुए कहा कि दलित समाज को एकरूप वर्ग मानना सही नहीं होगा। इसके भीतर भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में काफी अंतर है। यदि कुछ जातियों को आरक्षण का लाभ लगातार ज्यादा मिल रहा है और कुछ समुदाय अभी भी पीछे हैं, तो सबसे वंचित लोगों तक अवसर पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए?

उन्होंने EWS और पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग का उदाहरण देते हुए कहा कि जब सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है और पिछड़े वर्ग में भी पिछड़ा तथा अतिपिछड़ा की पहचान की जा सकती है, तो दलित समाज के भीतर वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए अलग व्यवस्था पर विचार करना गलत नहीं होना चाहिए।

संतोष सुमन का संदेश साफ है—आरक्षण को खत्म करने की बात नहीं, बल्कि उसकी पहुंच को ज्यादा न्यायपूर्ण बनाने की जरूरत है। उन्होंने इसे बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक अधिकार को वास्तविक हकदारों तक पहुंचाने से जोड़ा।

यानी एक तरफ चिराग पासवान आरक्षण को किसी भी तरह कमजोर करने के खिलाफ खुलकर खड़े हैं, तो दूसरी तरफ संतोष सुमन आरक्षण की समीक्षा और उसके भीतर उप-वर्गीकरण की वकालत कर रहे हैं। दोनों नेताओं का अंतिम लक्ष्य आरक्षण व्यवस्था को लेकर अलग-अलग नजरिए के साथ सामने आ रहा है, लेकिन बहस का केंद्र सामाजिक न्याय ही है।

इस मुद्दे पर बिहार भाजपा भी अपना रुख साफ कर चुकी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी शुरू से आरक्षण के पक्ष में रही है। कर्पूरी ठाकुर के दौर में मंडल व्यवस्था से लेकर वीपी सिंह सरकार के समय आरक्षण लागू होने तक भाजपा के सहयोग का हवाला देते हुए कहा गया कि आरक्षण को लेकर किसी तरह की अफवाह नहीं फैलनी चाहिए। पार्टी की ओर से दावा किया गया कि आरक्षण जैसा है, वैसा ही रहेगा और भाजपा इसके खिलाफ नहीं है।

वहीं जेडीयू की ओर से भी आरक्षण के समर्थन की बात कही गई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाज के सभी वर्गों को अवसर देने का काम किया है। दलित, पिछड़ा और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग—सभी को आगे बढ़ाने की जरूरत है। जेडीयू ने अतिपिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अलग वर्गीकरण की मांग का भी समर्थन किया है।

ऐसे में आरक्षण पर छिड़ी यह बहस सिर्फ दो नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं दिख रही। एक तरफ ‘आरक्षण बचाओ’ की आवाज है, तो दूसरी तरफ आरक्षण के लाभ को सबसे वंचित तबके तक पहुंचाने के लिए समीक्षा और उप-वर्गीकरण की मांग। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सामाजिक न्याय की राजनीति में और बड़ा सवाल बन सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आरक्षण की समीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का रास्ता है या इससे आरक्षण को लेकर नई राजनीतिक बहस खड़ी होगी? चिराग पासवान और संतोष सुमन के बयानों ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि आरक्षण का मुद्दा अभी बिहार से लेकर दिल्ली तक राजनीति का बड़ा केंद्र बना रहने वाला है।